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आपबीती: ब्रिटिश युवक की दर्द भरी दास्तां, बोला- घर में बैठना मौत के पास जाने से अच्छा है

Wed, 01 Apr 2020 07:03 AM IST
योगेश साहू वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन।
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कोरोनावायरस: कैलम विशार्ट - फोटो : Amar Ujala
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मैं कैलम विशार्ट (25) साल का हूं और ब्रिटेन के एडिनबर्ग में रहता हूं। मुझे लगता था कि मैं काफी एहतियात बरतता हूं और मुझे कोरोना नहीं होगा। एक हफ्ते पहले शनिवार को मेरे को हल्का बुखार जैसा महसूस हुआ। मैंने सोचा कि थकावट की वजह से ऐसा हो रहा है।

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कई घंटे गुजर गए लेकिन मेरी हालत सुधरने की बजाय बिगड़ती चली गई। मुझे बेचैनी होने लगी और खाना खाने में भी तकलीफ हो गई। अस्पताल पहुंचा तो कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई। मैं सभी से अपील करता हूं कि ‘आप सब घर में रहें, बेवजह का जानलेवा वायरस से खतरा मोल न लें।

मैं नहीं चाहता कि जो दर्द मैंने महसूस किया है वो आप या कोई और देखे। मैंने अपने जीवन का सबसे खतरनाक अनुभव महसूस किया जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता हूं। अब मैं ठीक हूं।
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बोलना तक मुश्किल था
वायरस ने मुझे इस कदर जकड़ लिया कि सांस लेना और बोलना दूभर हो गया। अस्पताल में जब मैं बोलने की कोशिश करता तो असहनीय दर्द होता था जिसे मैं बयां नहीं कर सकता। मेरी सांस उखड़ती थी। ऐसे लगता था कि अब जिंदगी खत्म हो जाएगी। मेरा शरीर टूट चुका था। मैं एक गिलास पानी उठाकर नहीं पी सकता था।

डॉक्टर व स्टाफ तक डरते थे

डॉक्टर व दूसरे पैरामेडिकल स्टाफ मेरी जिंदगी बचाने में जुटे थे पर मैंने उनके डर को भी देखा है। वो जब भी मेरे पास आते थे, अपने काम के बाद दस्ताने, मास्क और जरूरी चीजें तुरंत बदलते थे। यानी मैं किसी की जान के लिए खतरनाक हो चला था।

घर में रहें, जिंदगी बचाएं
लॉकडाउन के बीच आप घर में कैद होकर लोगों की जिंदगी बचा रहे हैं। इसका महत्व समझें। जरूरत पर ही बाहर निकलें। ऐसा करने पर ही आप खुद की और आसपास के लोगों की जिंदगी बचा रहे होते हैं।
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घर में बैठना मौत के पास जाने से अच्छा है

घर में बैठकर ऊब जाना मौत के पास जाने से अच्छा है। कोरोना तो लोगों के बाहर निकलने का इंतजार करता है क्योंकि उसे तड़पती हुई जिंदगी वाला इंसान पसंद है।
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