गंभीर निमोनिया में भी मरीज तेजी से सांस ले रहे थे और कई मरीज मोबाइल चला रहे थे। इस विचित्र स्थिति को समझने की कोशिश में मोटे तौर पर पता चला कि संक्रमण के बाद ऑक्सीजन का स्तर तो कम होता है लेकिन फेफड़े क्रियाशील रहते हैं।
फेफड़ों में नुकसान से मर रहे लोग
साइलेंट हाइपोक्सिया के कारण मरीजों के मरने का कारण सांस की कमी नहीं बल्कि फेफड़ों की क्षति होता है। काफी मरीज गंभीर निमोनिया की स्थिति में ही आपातकालीन कक्ष में पहुंचे। कई को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ती है और मशीनों के अभाव में जानें जाती हैं।
पल्स ऑक्सीमीटर बचा सकता है जान
- कम वेंटिलेटरों का इस्तेमाल स्वास्थ्य तंत्र और मरीज, दोनों की जीत है। साइलेंट हाइपोक्सिया का पता पल्स ऑक्सीमीटर से लगा सकते हैं। इसे चलाना थर्मामीटर जितना ही आसान है। इसके डिस्प्ले पर दो अंक दिखाई देंगे। एक ऑक्सीजन सैचुरेशन का, दूसरा पल्स रेट का।
- हाइपोक्सिया का पता लगने, समय पर उपचार और सही निगरानी के कारण ही ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ठीक हो पाए।