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हार्वर्ड के विशेषज्ञ ने कहा...सालभर में कोरोना की चपेट में आ सकती है दुनिया की 70% आबादी

Mon, 30 Mar 2020 05:51 AM IST
Rajeev Rai वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला

सार

  • सौ साल पहले भी महामारी फैलने पर जारी हुई थी आज जैसी गाइडलाइन
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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वर्षों पहले नोबल पुरस्कार विजेता जोशुआ लेडरबर्ग ने कहा था कि किसी दूसरे देश में एक बच्चे को बीमार करने वाला एक विषाणु आप तक पहुंच सकता है और आगे चलकर वैश्विक महामारी में तब्दील हो सकता है। कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण ने उनकी भविष्यवाणी को एक बार फिर सही साबित कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे कोविड-19  नाम देकर महामारी घोषित किया है।

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लाखों लोगों को चपेट में लेने वाले इस वायरस के संभावित असर के बारे में कई आकलन किए गए हैं। हार्वर्ड के महामारी रोगों के विशेषज्ञ मार्क लिपसिच ने कहा कि 1 साल के भीतर विश्व की 70 प्रतिशत आबादी तक इससे प्रभावित हो सकती है। 

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लाखों लोगों की जा चुकी जान 

प्लेग और इन्फ्लुएंजा जैसी महामारियों के कारण कई बार लाखों जानें जा चुकी हैं। एंटीबायोटिक्स की खोज के बाद साल 1967 में अमेरिका के सर्जन विलियम स्टीवर्ट ने कहा था कि अब महामारियों खत्म करने का वक्त आ गया है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिछले तीन दशकों में करीब 40 नए विषाणु सामने आए हैं।

आम तौर पर यह माना जाता है कि पिछड़ापन और गरीबी संक्रामक बीमारियों के लिए सबसे बड़ा आमंत्रण होता है। यह काफी हद तक सही भी है, लेकिन विकसित देशों में कोरोना वायरस के प्रकोप को देखकर यह स्पष्ट है कि समृद्ध देश भी अछूते नहीं हैं। दरअसल, मानव विकास और संक्रामक बीमारियों के बीच गहरा रिश्ता है। संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स में भी इसे तीसरे स्थान पर रखा गया है। विकास का एक दूसरा पहलू भी है। विकास की प्रक्रिया में नई तकनीकें आती हैं, नए बांध और नहर बनाए जाते हैं, जंगलों की कटाई होती है, प्रवासी आबादी का विस्तार होता है, शहरीकरण बढ़ता है और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों में इजाफा होता है। ये कारण संक्रामक बीमारियों के प्रसार में सहायक होते हैं।
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राष्ट्रीय क्षमता होती है कमजोर, गरीबों पर पड़ता है सबसे बुरा असर

महामारियां हर प्रभावित देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालती हैं, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव गरीबों पर पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र भी कह चुका है कि महामारियां राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होती हैं। 1950 से 1991 के बीच 20 देशों में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक संक्रामक बीमारियां मृत्यु दर को बढ़ाने के साथ राष्ट्रीय क्षमताओं को कमजोर करती हैं और गरीबी बढ़ाती हैं। अध्ययन में विकसित, विकासशील और अविकसित देशों को शामिल किया गया था। महामारियों के चलते देश की आर्थिक ताकत कमजोर होती है और इसका असर वित्तीय संसाधनों, लोगों तक पहुंच और जवाबी कार्रवाई, स्वायत्तता आदि पर स्पष्ट दिखता है। संक्रामक बीमारियों के बार-बार फैलने से राष्ट्रीय सुरक्षा भी प्रभावित होती है। 
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