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COP27: इस वर्ष मिस्र में आयोजित होगा संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, जानें इससे संबंधित अहम बातें

Thu, 03 Nov 2022 12:23 PM IST
शैलजा श्रीवास्तव यूएन हिंदी समाचार

सार

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP27) मिस्र के शर्म अल-शेख में 6 से 18 नवम्बर तक आयोजित होगा जिसमें विश्व भर में हो रहीं मौसम संबंधी घटनाओं, यूक्रेन में युद्ध के कारण उपजे ऊर्जा संकट और उसके वैज्ञानिक तथ्यों व चेतावनियों पर बात की जाएगी। 
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मिस्र के शर्म अल-शेख़ में सूर्यास्त का दृश्य. - फोटो : UN News
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विस्तार
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यूएन महासचिव यूएन महासचिव ने विशेष जोर देते हुए कहा है कि COP27 सम्मेलन में मौजूदा समस्याओं के स्तर के अनुरूप, जलवायु समाधानों पर सहमति बनानी होगी। परंतु क्या यह संभव हो पाएगा?
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संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन की आधिकारिक शुरुआत 6 नवंबर को होगी। मगर, उससे पहले हमने आपके लिए कुछ अहम जानकारी जुटाई है, जिसे जानना आपके लिए अहम होगा...

कॉप26 सम्मेलन की मुख्य बैठक के दौरान प्रतिनिधि


ये सभी COP सम्मेलन आयोजित किए जाने की क्या वजह है?

जलवायु परिवर्तन पर यूएन फ्रेमवर्क संधि (UNFCCC) के संबद्ध पक्षों (Conference of the Parties/COP) का वार्षिक सम्मेलन, जलवायु संबंधी विषयों पर सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण आयोजन है। वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जैनेरियो में पर्यावरण और विकास के मुद्दे पर यूएन पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) के दौरान, जलवायु परिवर्तन पर यूएन फ्रेमवर्क संधि पारित की गई, और इसके लिए समन्वय संस्था - UNFCCC स्थापित की गई।
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UNFCCC का लक्ष्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों में कटौती लाना है ताकि मानवीय गतिविधियों की वजह से होने वाले जलवायु परिवर्तन के खतरनाक दुष्प्रभावों की रोकथाम की जा सके। अब तक 197 पक्षों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं। वर्ष 1994 से यह संधि लागू हो गई, और उसके बाद से हर वर्ष संधि के संबद्ध पक्षों के सम्मेलन, या COPs, औपचारिक वैश्विक जलवायु शिखर बैठकें आयोजित की जाती रही हैं। हालांकि, वर्ष 2020 इसका एक अपवाद है क्योंकि कोविड-19 महामारी के कारण COP26 के आयोजन में एक वर्ष की देरी हुई है।

इन बैठकों के दौरान, देशों ने उत्सर्जन पर कानूनी रूप से सीमाएं स्थापित करने के लिए मूल संधि के विभिन्न विस्तारों पर बातचीत की है। उदाहरणस्वरूप, वर्ष 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल और 2015 में पेरिस जलवायु समझौता- जिसमें सभी देशों ने वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने और जलवायु कार्रवाई के लिए वित्त पोषण को बढ़ावा देने के प्रयासों को मजबूती देने पर सहमति व्यक्त की है।

मिस्र में यूएन फ्रेमवर्क संधि (UNFCCC) के संबद्ध पक्षों (Conference of the Parties/COP) के 27वें सम्मेलन का आयोजन होगा।

अन्य कॉप सम्मेलनों की तुलना में COP27 किन मायनों में अलग है?

वर्ष 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते के बाद, वर्ष 2021 में पांचवी बार, संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP26) आयोजित किया गया क्योंकि कोविड-19 महामारी के कारण 2020 मे सम्मेलन आयोजित नहीं हो पाया था। COP26 के दौरान 'ग्लासगो जलवायु समझौते' (Glasgow Climate Pact) पर सहमति हुई, जिसमें वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की बात कही गई है। पेरिस समझौते को वास्तविकता में पूर्ण रूप से लागू किए जाने के सिलसिले में भी प्रगति दर्ज की गई, और व्यावहारिक उपायों के लिए पेरिस नियम पुस्तिका (Paris Rulebook) को अंतिम रूप दिया गया।

COP26 बैठक में देशों ने इस वर्ष मजबूत संकल्प सुनिश्चित किए जाने पर सहमति जताई थी, जिसके तहत राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाओं को अधिक महत्वाकांक्षी बनाया जाना शामिल है। मगर, 193 में से केवल 23 देशों ने ही फिलहाल संयुक्त राष्ट्र को अपनी योजनाएं भेजी हैं। ग्लासगो सम्मेलन के दौरान वार्ता कक्षों के भीतर व बाहर भी, नैट-शून्य उत्सर्जन, वन संरक्षण और जलवायु वित्त पोषण समेत विभिन्न क्षेत्रों में अनेक संकल्प लिए गए।

प्रसिडेंट के विजन स्टेटमेंट के अनुसार, COP27 सम्मेलन के दौरान अब इन सभी वादों और संकल्पों को लागू किए जाने की योजना पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा। सम्मेलन के मेजबान देश मिस्र ने धरातल पर पूर्ण, सामयिक, समावेशी और विस्तृत कार्रवाई की बाज की है।

स्कॉटलैंड के ग्लासगो में कॉप26 आयोजन स्थल के बाहर नागरिक समाज संगठन जलवायु कार्रवाई के लिये प्रदर्शन कर रहे हैं


विशेषज्ञों के अनुसार, पेरिस नियम पुस्तिका को लागू किए जाने के माध्यमों की समीक्षा किए जाने के अलावा, सम्मेलन के दौरान उन बिंदुओं पर भी चर्चा होगी, जिन पर ग्लासगो में बातचीत का निष्कर्ष नहीं निकल पाया था। इन मुद्दों में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली 'हानि व क्षति' के लिए वित्त पोषण का विषय भी शामिल है। यह जलवायु संकट से अग्रिम मोर्चे पर जूझ रहे उन देशों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां इसके दुष्परिणाम उनके अनुकूलन प्रयासों से कहीं अधिक होंगे। इस क्रम में, अनुकूलन वित्त पोषण के लिए विकसित देशों ने निम्न-आय वाले देशों के लिए हर वर्ष 100 अरब डॉलर की रकम मुहैया कराने का वायदा किया है, मगर अभी इसे पूरा किया जाना शेष है।

बातचीत के दौरान, तकनीकी मुद्दों पर भी चर्चा होगी। उदाहरणस्वरूप, विभिन्न देशों द्वारा कार्बन उत्सर्जन को मापने के लिए विशिष्ट रास्तों को चिन्हित किया जाएगा, ताकि हर एक देश का समान मापदंडों पर आंकलन किया जा सके।

इन विचार-विमर्श के माध्यम से वर्ष 2023 में होने वाले अगले जलवायु सम्मेलन, COP28 का मार्ग प्रशस्त होगा, जिसमें पहली बार वैश्विक आंकलन किया जाएगा। यानि, कार्बन उत्सर्जन में कटौती, अनुकूलन और पेरिस समझौते को लागू किए जाने के प्रयासों में सामूहिक प्रगति की समीक्षा की जाएगी।

इस वर्ष सम्मेलन के लिए बड़े उद्देश्य क्या हैं?

1. कार्बन उत्सर्जन में कटौती: देश अपने उत्सर्जनों में किस प्रकार से कटौती कर रहे हैं?

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाना या उनकी रोकथाम करना (mitigation) है। इसका अर्थ नई टेक्नोलॉजी व नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग करना, पुराने उपकरणों की ऊर्जा दक्षता बेहतर बनाना, प्रबंधन के तौर-तरीको और उपभोक्ताओं के व्यवहार में बदलाव लाना शामिल है। सभी देशों से यह अपेक्षा है कि वे बताएं कि वे किस प्रकार ग्लासगो सम्मेलन में हुई सहमति को लागू करने, जलवायु योजनाओं की समीक्षा करने और उत्सर्जन कटौती के लिए कार्य योजना तैयार करने पर काम कर रहे हैं। इसका मन्तव्य है 2030 के लिए और अधिक महत्वाकांक्षी उत्सर्जन लक्ष्य प्रस्तुत करना, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के अनुसार वर्तमान योजनाएं अभी भी भयावह वार्मिंग से बचने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

जीवाश्म ईंधन बिजली संयंत्र ग्रीनहाउस गैसों के सबसे बड़े उत्सर्जक में से एक हैं जो जलवायु परिवर्तन का कारण बनते हैं


2. अनुकूलन: देश किस तरह अनुकूलन प्रयास करेंगे और दूसरों को ऐसा करने में सहायता देंगे?

जलवायु परिवर्तन दस्तक दे चुका है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती और वैश्विक तापमान वृद्धि की गति धीमी करने के लिए हरसंभव प्रयासों से इतर, देशों को जलवायु परिवर्तन के नतीजों का सामना करने के लिए स्वयं को ढालना होगा, ताकि आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। इसका असर, इस बात पर भी निर्भर करता है कि कौन सा देश, किस भौगोलिक क्षेत्र में है और किन आपदाओं की चपेट में आ सकता है। जैसेकि आग लगने की घटनाएं, बाढ़ और सूखा, अत्यधिक गर्मी या सर्दी या फिर समुद्री जलस्तर में वृद्धि।

COP26 सम्मेलन के दौरान, प्रतिनिधियों ने एक कार्यक्रम (Work Programme) पारित किया था, जोकि पेरिस समझौते में स्थापित वैश्विक अनुकूलन लक्ष्य पर आधारित है। इस योजना के माध्यम से समुदायों व देशों द्वारा अपनाए जा रहे अनुकूलन उपायों के लिए उपाय मुहैया कराना है, ताकि दुनिया को जलवायु-सहनसक्षम भविष्य की दिशा में बढ़ाए जाने में मदद मिल सके।

पिछले वर्ष, विकसित देशों ने अनुकूलन प्रयासों के लिए वित्त पोषण को कम से कम दोगुना किए जाने पर सहमति व्यक्त की थी। अनेक हितधारकों ने इससे भी अधिक स्तर पर अनुकूलन प्रयासों के लिए धनराशि मुहैया कराए जाने और उसे कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर केन्द्रित वित्त पोषण के समकक्ष बनाने पर जोर दिया है, जैसाकि पेरिस समझौते में निहित है। मिस्र के शर्म अल-शेख में सम्मेलन के दौरान यह चर्चा का एक बड़ा मुद्दा होगा।

UNFCCC का स्पष्ट रूप से मानना है कि मौजूदा व भावी जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए, अनुकूलन वित्त पोषण के स्तर में बड़ी वृद्धि किया जाना जरूरी है। निजी व सार्वजनिक, सभी स्रोतों से यह करना होगा, और सरकारों, वित्तीय संस्थाओं व प्राइवेट सेक्टर समेत सभी पक्षों को इसका हिस्सा बनना होगा।

3. जलवायु वित्त पोषण: वह मुद्दा जो सदैव चर्चा में रहता है 

जलवायु वित्त पोषण एक बार फिर COP27 सम्मेलन के दौरान एक अहम थीम होगी। वित्त पोषण संबंधई चर्चाएं पहले से ही एजेंडा का हिस्सा हैं। विकासशील देशों ने पर्याप्त व उपयुक्त वित्त पोषण सुनिश्चित करने के लिए विकसित देशों से आग्रह किया है, विशेष रूप से सर्वाधिक संवेदनशील हालात का सामना करने वाले देशों के लिए। बैठक के दौरान, विकसित देशों द्वारा प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर मुहैया कराए जाने का वादा संभवत: गहन चर्चा के केन्द्र में रहेगा, जिसे अभी पूरा नहीं किया जा सका है।

वर्ष 2009 में कोपेनहागन सम्मेलन के दौरान, धनी देशों ने इस वित्त पोषण का संकल्प लिया था, लेकिन आधिकारिक जानकारी के अनुसार, यह लक्ष्य अभी अधूरा है। विशेषज्ञों ने उम्मीद जताई है कि वर्ष 2023 में COP27 के दौरान इस संकल्प को अन्तत: वास्तविकता में बदल दिया जाएगा। सम्मेलन के अध्यक्ष देश मिस्र ने इस मुद्दे के साथ-साथ अतीत में किए गए अन्य संकल्पों-प्रतिज्ञाओं को ध्यानार्थ लाने का इरादा व्यक्त किया है।

हेती के उत्तरी क्षेत्र में किसान, ऐसे उपायों पर काम करते हुए जिनसे उनकी कृषि भूमि के क्षय को रोकने में मदद मिलेगी

चर्चा में घिरा रहने वाला जलवायु 'हानि व क्षति' (Loss and Damage) का मुद्दा आखिरकार है क्या?

जलवायु परिवर्तन, चरम मौसम घटनाओं जैसे कि चक्रवाती तूफान, मरुस्थलीकरण और समुद्री जल के बढ़ते स्तर के जरिए, देशों को क्षति पहुंचाता है, जिसकी उन्हें एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। आमतौर पर इन घटनाओं को प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देखा जाता है मगर अब इन जलवायु प्रभावों की गहनता बढ़ रही है, जिसकी वजह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के स्तर का बढ़ना है। इसके लिए मुख्यत: समृद्ध औद्योगीकृत देश जिम्मेदार हैं, जबकि इससे सबसे अधिक विकासशील देश प्रभावित होते हैं, और उनकी मांग है कि इसके लिए उन्हें मुआवजा दिया जाए।

सितंबर 2022 में यूएन महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह के दौरान डेनमार्क ने जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली क्षति की भरपाई के लिए विकासशील देशों को एक करोड़ 30 डॉलर प्रदान करने की घोषणा की। यह कदम उठाने वाला डेनमार्क पहला देश है। इन भुगतानों का मुद्दा, जिसे ‘हानि व क्षति’ भी कहा जाता है, वो COP27 में विचार-विमर्श का एक बड़ा विषय रहेगा, जबकि वो अभी आधिकारिक एजेंडा का हिस्सा नहीं है।

समूह 77 और चीन में करीब सभी विकासशील देश शामिल हैं, और उन्होंने इसे एजेंडे में शामिल किए जाने का अनुरोध किया है। इसके लिए, जलवायु सम्मेलन के पहले दिन सभी देशों में आम सहमति होने की आवश्यकता होगी। अब तक, एक ‘हानि व क्षति’ कोष स्थापित किए जाने पर चर्चा हुई है, मगर ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।

मानवाधिकार और जलवायु पर यूएन के विशेष दूत इयान फ्राय समेत अन्य विशेषज्ञों ने इस दिशा में प्रयासों की गति बढ़ने और इस लक्ष्य को हासिल किए जाने की आशा जताई है। उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि मुख्य उत्सर्जक बड़े देश खड़े हों और कहें कि हमें कुछ करना होगा, हमें इन निर्बल देशों के लिए अपना योगदान देना होगा।


प्रशांत क्षेत्र के तटीय इलाके जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील इलाकों में हैं

यूक्रेन में जारी युद्ध मौजूदा हालात को किस तरह प्रभावित कर रहा है?

संयुक्त राष्ट्र में पलाऊ देश की स्थाई प्रतिनिधि और जलवायु वार्ताकार इलाना साइड ने बताया कि मौजूदा सामाजिक-राजनैतिक भूदृश्य और ऊर्जा संकट के कारण COP सम्मेलन ‘भ्रामक’ हो सकता है। उन्होंने कहा कि यूक्रेन में युद्ध हुआ इसलिए ऐसी अनेक बाते हैं जिन पर देशों में सहमति हुई और अब वे उन्हें नहीं कर सकते हैं। इस युद्ध के परिणामस्वरूप, भूदृश्य में परिवर्तन हुआ है।

निश्चित ही यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद से महंगाई बढ़ी है और वैश्विक ऊर्जा, खाद्य व सप्लाई चेन में संकट उपजा है। जर्मनी जैसे देशों को अल्पावधि के लिए अपने जलवायु लक्ष्यों का स्तर कम करना पड़ रहा है, जबकि ग्लासगो में चीन-अमेरिका के जिस ऐतिहासिक कार्यसमूह की घोषणा की गई थी, उसे फिलहाल स्थगित कर दिया गया है।

COP27 के दौरान उन संकल्पों व प्रतिबद्धताओं को झटका लगने की आशंका है, जिन्हें देशों ने पिछले वर्ष किया था। मगर, यूएन के विशेष दूत इयान फ्राय का मानना है कि यह युद्ध देशों के लिए, ऊर्जा में आत्मनिर्भरता के लिए नींद से जगा देने वाली घंटी साबित हो सकता है।

स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ का मानना है कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सबसे किफायती तरीका नवीकरणीय ऊर्जा का सहारा लेना है, जोकि उत्सर्जन घटाने के नजरिए से अहम हैं। उन्होंने कहा कि हम देख रहे हैं कि पोर्तुगल 100 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हम जानते हैं कि डेनमार्क भी ऐसा कर रहा है, और हमारा सोचना है कि इससे अन्य देश भी नवीकरणीय और ऊर्जा के क्षेत्र  में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता समझेंगे और उस दिशा में आगे बढ़ेंगे।


13 नवंबर को ग्लासगो में COP26 की समाप्ति पर प्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया। यह यूएन जलवायु सम्मेलन 31 अक्टूबर को शुरू हुआ था।
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क्या COP27 सम्मेलन के दौरान नागरिक समाज की भी भागेदारी होगी?

मुख्य कार्यक्रम शर्म अल-शेख के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में 6 नवम्बर से 18 नवम्बर तक आयोजित होगा। अब तक लगभग 30 हजार देशों ने सम्मेलन में शिरकत करने के लिए पंजीकरण कराया है, जोकि सरकारों, व्यवसायों, गैर-सरकारी संगठनों और नागरिकों के समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यूएन संधि में संबद्ध पक्षों की संख्या 197 है, जोकि वार्ता के लिए अक्सर समूहों (blocs) में संगठित होते हैं, जैसेकि G77 और चीन, अफ्रीका समूह, सबसे कम विकसित देशों का समूह, लातिन अमेरिका व कैरीबियाई देशों का स्वतंत्र गठबंधन।

वार्ता में पर्यवेक्षक भी हिस्सा लेंगे, जिनकी औपचारिक रूप से कोई भूमिका नहीं है, मगर वे हस्तक्षेप कर सकते हैं जिससे पारदर्शिता बनाए रखने में मदद मिलेगी। इन पर्यवेक्षकों में यूएन एजेंसी, अंतर सरकारी संगठन, गैर-सरकारी संगठन, आस्था-आधारित समूह और मीडिया शामिल हैं। आधिकारिक स्तर पर विचार-विमर्श के अलावा, सम्मेलन कक्षों, मंडप स्थल का भी प्रबंधन किया जाएगा, और इसके समानान्तर हजारों अन्य कार्यक्रम, एक दिवसीय थीम के अंजर्गत आयोजित किए जाएंगे।

इस वर्ष की थीम हैं- वित्त पोषण, विज्ञान, युवा व भावी पीढ़ियां, डीकार्बोनाइजेशन, अनुकूलन व कृषि, लैंगिक मुद्दे, जल, नागरिक समाज, ऊर्जा, जैवविविधता और समाधान (यह कॉप की नवीनतम थीम है)। हमेशा की तरह इस बार भी जलवायु सम्मेलन दो अलग-अलग जोन में आयोजित होगा – ‘ब्लू जोन’ और ‘ग्रीन जोन’, जोकि इस वर्ष एक दूसरे के आमने सामने मौजूद होंगे। ‘ब्लू जोन’ का प्रबंधन संयुक्त राष्ट्र के पास होगा, जहां वार्ता आयोजित की जाएगी और जहां प्रवेश के लिए सभी प्रतिभागियों को UNFCCC सचिवालय की स्वीकृति जरूरी होगी।

इस वर्ष ‘ब्लू जोन’ में 156 मंडप (pavilions) होंगे, जोकि ग्लासगो की तुलना में दोगुनी संख्या है। यूएन की अनेक एजेंसी, देशों और क्षेत्रों का यहां प्रतिनिधित्व होगा, और पहली बार युवा और कृषि-खाद्य के लिए भी एक पवेलियन बनाया जाएगा।

‘ग्रीन जोन’ का प्रबन्धन मिस्र सरकार की देखरेख में होगा। पंजीकरण होने पर इसमें प्रवेश संभव होगा, जहां संवाद, जागरूकता, शिक्षा व जलवायु पर कार्रवाई के लिए संकल्प को बढ़ावा देने के इरादे से विभिन्न कार्यक्रम, प्रदर्शनी, और कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी। मिस्र के अनुसार, ‘ग्रीन जोन’ एक ऐसा मंच है जहां व्यावसायिक समुदाय, युवा, नागरिक व आदिवासी समाज, शिक्षाविद, कलाकार समेत अन्य समुदायों व क्षेत्रों से लोग स्वयं को अभिव्यक्त कर पाएंगे और उनकी आवाज़ों को सुना जा सकेगा। इस वर्ष, ‘ग्रीन जोन’ में एक विशेष ‘विरोध जोन’ (protest zone) के साथ बाहर स्थित एक विश्राम स्थल का प्रबंध किया जाएगा।

(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)
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