यूरो ज़ोन में बेलगाम महंगाई से सरकारों की नींद उड़ रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक उपभोक्ता वस्तुओं की महंगाई दर वार्षिक आठ फीसदी से ज्यादा है, जबकि यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) ने मुद्रास्फीति दर को दो फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य तय कर रखा है। लंदन से प्रकाशित पत्रिका द इकोनॉमिस्ट की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक महंगाई दर बेलगाम बने रहने के कारण अब इस बात की पूरी संभावना है कि ईसीबी की गवर्निंग काउंसिल ब्याज दर बढ़ाने का फैसला करेगी। इसकी घोषणा अगले नौ जून को हो सकती है।
कुछ ताजा विश्लेषणों में बताया गया है कि यूरोप के ताजा संकट के पीछे सबसे बड़ा हाथ ऊर्जा की महंगाई का है। प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल का भाव यूक्रेन युद्ध के पहले भी चढ़ रहा था। लेकिन युद्ध ने इस बढ़ोतरी की रफ्तार काफी तेज कर दी। इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन शैक्स ने बताया है कि मई में यूरोप में ऊर्जा महंगाई की दर 39 फीसदी रही। इसकी वजह से कुल मुद्रास्फीति में चार प्रतिशत की वृद्धि हुई।
द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट में बताया गया है कि ऊर्जा और खाद्य पदार्थों को छोड़ कर मापे जाने वाले ‘कोर इन्फ्लेशन’ की दर भी मई में तेजी से बढ़ी। जर्मनी में पिछले साल के मई की तुलना में उत्पादक मूल्य (थोक मूल्य) सूचकांक 33.5 प्रतिशत रहा। इसका कारण ऊर्जा के अलावा धातु, कंक्रीट और केमिकल्स के दाम में हुआ तेज इजाफा भी रहा।
अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि महंगाई के कारण जहां कारखानों की लागत बढ़ रही है, वहीं आम घरों की क्रय शक्ति गिर रही है। इसे देखते हुए यूरोपियन यूनियन के कई सदस्य देशों ने आम लोगों को राहत पहुंचाने की योजनाएं शुरू की हैं। थिंक टैंक ब्रुएगेल के मुताबिक जर्मनी, फ्रांस और इटली में लोगों को राहत पहुंचाने पर उनके जीडीपी का एक से दो फीसदी हिस्सा खर्च किया जा रहा है। कुछ देशों ने कीमत बढ़ोतरी पर लगाम लगाने वाले कदम उठाए हैं। लेकिन इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसी सब्सिडियों के कुछ लाभ आम लोगों के बजाय ऊर्जा कंपनियां बटोर ले जा रही हैं।