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UK: ब्रिटेन के शाही खजाने में भारतीय ज्वेलरी, औपनिवेशिक काल की फाइल से पता चला

Fri, 07 Apr 2023 05:57 PM IST
देव कश्यप पीटीआई, लंदन।

सार

इस सप्ताह एक रिपोर्ट में भारतीय अभिलेखागार कार्यालय से उजागर हुई एक उल्लेखनीय 46-पेज के फाइल का संदर्भ दिया गया है, जो एक जांच का विवरण देती है। इसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि दिवंगत महारानी एलिजाबेथ द्वितीय की दादी क्वीन मैरी द्वारा उनके गहनों को शाही परिवार में शामिल किया गया था। 
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किंग चार्ल्स तृतीय (फाइल फोटो)। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारतीय अभिलेखागार कार्यालय से औपनिवेशिक युग की एक फाइल की खोज से राजा चार्ल्स तृतीय के कई रत्नों सहित शाही परिवार के कब्जे में आए कई कीमती रत्नों और ज्वेलरी के बारे में पता चला है। यह कार्यालय भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश शासन के दौरान एक जिम्मेदार ब्रिटिश सरकारी विभाग था। द गार्जियन अखबार छह मई को वेस्टमिंस्टर एब्बे में होने वाले किंग चार्ल्स तृतीय के राज्याभिषेक के मद्देनजर ब्रिटेन की शाही संपत्ति और वित्त की जांच कर रहा है। इसे लेकर अखबार 'ब्रिटिश क्राउन की लागत' से संंबंधित खबरों की एक श्रृंखला प्रकाशित कर रहा है।

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इसी के तहत इस सप्ताह एक रिपोर्ट में भारतीय अभिलेखागार कार्यालय से उजागर हुई एक उल्लेखनीय 46-पेज के फाइल का संदर्भ दिया गया है, जो एक जांच का विवरण देती है। इसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि दिवंगत महारानी एलिजाबेथ द्वितीय की दादी क्वीन मैरी द्वारा उनके गहनों को शाही परिवार में शामिल किया गया था। इसके संदर्भों में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के अस्तबल में घोड़ों को सजाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक पन्ना-जड़ित सोने का करधनी है, जो अब किंग चार्ल्स के शाही संग्रह का हिस्सा है।

यह रिपोर्ट 1912 की है, जो बताती है कि कैसे चार्ल्स की पन्ना जड़ित बेल्ट सहित कई अनमोल टुकड़े भारत से विजयी ट्राफियों के रूप में निकाले गए और बाद में महारानी विक्टोरिया को दिए गए। गार्जियन की जांच में इसका खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन वस्तुओं के बारे में वर्णन किया गया है वे अब ब्रिटिश क्राउन की संपत्ति के रूप में सम्राट के स्वामित्व में हैं।
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खोजों में ब्रिटिश सोसाइटी डायरिस्ट फैनी ईडन और उनके भाई जॉर्ज द्वारा 1837 में पंजाब के दौरे का रिकॉर्ड रखने वाली एक पत्रिका शामिल है। जॉर्ज भारत में तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर जनरल थे और शक्तिशाली राजा रणजीत सिंह से मिलने पंजाब गए थे। जिन्होंने उस समय अंग्रेजों के साथ तथाकथित दोस्ती की संधि पर हस्ताक्षर किए थे। उनके साम्राज्य में गहनों की भरमार को देख हैरतअंगेज ईडन ने लिखा था, वह अपने घोड़ों को बेहतरीन गहने पहनाते हैं और उनके साज-सज्जा और आवास की भव्यता किसी भी ऐसी चीज से बढ़कर है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। ईडन ने लिखा, अगर कभी हमें इस राज्य को लूटने की अनुमति दी गई, तो मैं सीधे उनके अस्तबल में जाऊंगा।

बाद में 19वीं सदी में राजा रणजीत सिंह के बेटे और वारिस दलीप सिंह को पंजाब को ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपने के लिए मजबूर किया गया था और ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, राज्य के अस्तबल लूट के कई लक्ष्यों में से एक रहे होंगे। कहा जाता है कि कुख्यात कोह-ए-नूर हीरा ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों द्वारा ऐसी ही एक लूट के परिणामस्वरूप महारानी विक्टोरिया के कब्जे में आया था।

द गार्जियन द्वारा उजागर किए गए दस्तावेज में पहचाने गए गहनों में चार बहुत बड़े स्पिनल माणिकों का छोटा हार शामिल है, जिनमें से सबसे बड़ा 325.5 कैरेट का स्पिनल है जिसे बाद में तैमूर रूबी के रूप में पहचाना जाने लगा था। एक अन्य भारतीय वस्तु के इतिहास के रूप में एक मोती का हार है, जिसमें 224 बड़े मोती हैं, जिसके बारे में यह भी माना जाता है कि यह राजा रणजीत सिंह के खजाने से आया था।

बकिंघम पैलेस के एक प्रवक्ता ने अखबार को बताया कि गुलामी और उपनिवेशवाद ऐसे मामले थे जिन्हें किंग चार्ल्स III गंभीरता से लेते हैं। यह भी पता चला है कि महल गुलामी के साथ ब्रिटिश राजशाही के ऐतिहासिक संबंधों में अनुसंधान का समर्थन कर रहा है।

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