अंटार्कटिका की पहचान उसकी दूर-दूर तक फैली सफेद बर्फ और बर्फीली पहाड़ियों से है, लेकिन अब इस बर्फीले महाद्वीप के कुछ हिस्सों में हरे और लाल रंग के धब्बे वैज्ञानिकों का ध्यान खींच रहे हैं। इनके पीछे बर्फ पर पनपने वाली सूक्ष्म शैवाल और पेंगुइन की बीट के बीच का संबंध है। पक्षियों के मल से मिलने वाले पोषक तत्व शैवाल की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। इससे बर्फ का रंग गहरा हो सकता है और उसकी सूरज की ऊर्जा परावर्तित करने की क्षमता घट सकती है। नतीजतन, स्थानीय स्तर पर बर्फ के पिघलने का खतरा बढ़ सकता है।
जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च : बायोजियोसाइंसेज में प्रकाशित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पश्चिमी अंटार्कटिका के अलग-अलग इलाकों से लाल और हरी शैवाल वाली बर्फ के नमूनों की जांच की। अध्ययन में सामने आया कि पक्षियों से मिलने वाले पोषक तत्व शैवाल की वृद्धि और उनके रंग से जुड़े हो सकते हैं। यह खोज अंटार्कटिका के बदलते पर्यावरण और बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
समुद्र से बर्फ तक पहुंचता है पोषण
पेंगुइन समुद्र में मछलियों और दूसरे छोटे समुद्री जीवों को खाते हैं। उनके भोजन से मिलने वाले पोषक तत्व बीट के रूप में जमीन और बर्फ पर पहुंचते हैं। स्कुआ जैसे दूसरे समुद्री पक्षी भी इस प्रक्रिया में योगदान देते हैं। इनके मल में मौजूद फॉस्फेट शैवाल की वृद्धि के लिए उपयोगी पोषक तत्व है। इस तरह समुद्र से पोषण हासिल करने वाले पक्षी अनजाने में बर्फ पर सूक्ष्म जीवों के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करते हैं।पर्याप्त पोषक तत्व मिलने पर शैवाल तेजी से बढ़ सकती हैं और बर्फ पर हरे रंग की परत बना सकती हैं। इस प्रक्रिया में पक्षियों की बीट प्राकृतिक खाद की तरह काम करती है।हालांकि, शैवाल की वृद्धि केवल पोषक तत्वों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि तापमान, नमी और अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियां भी इसमें भूमिका निभाती हैं।
हरी और लाल शैवाल का क्या है रहस्य
बर्फ पर उगने वाली शैवाल अलग-अलग रंगों में दिखाई दे सकती हैं। हरी शैवाल में क्लोरोफिल जैसे वर्णक प्रकाश संश्लेषण में मदद करते हैं। इसके जरिये वे सूर्य के प्रकाश का इस्तेमाल कर अपना भोजन बनाती हैं। दूसरी ओर, कुछ परिस्थितियों में शैवाल लाल रंग के सुरक्षात्मक वर्णक भी बनाती हैं, जो तेज रोशनी से उनकी कोशिकाओं की रक्षा करने में मदद कर सकते हैं। शोधकर्ताओं को हरी शैवाल वाली बर्फ के नमूनों में लाल शैवाल वाले नमूनों की तुलना में फॉस्फेट की मात्रा अधिक मिली। इससे संकेत मिलता है कि पक्षियों की बीट से मिलने वाला पोषण शैवाल की वृद्धि और उनके रंग को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, केवल रंग के आधार पर शैवाल की स्थिति या उसके व्यवहार के सभी कारणों का निर्धारण नहीं किया जा सकता।
गहरे रंग से बढ़ता है गर्मी सोखने का खतरा
सफेद बर्फ सूर्य की रोशनी का बड़ा हिस्सा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देती है। इस गुण को वैज्ञानिक भाषा में अल्बीडो कहा जाता है। लेकिन जब बर्फ पर शैवाल की रंगीन परत फैलती है, तो उसकी परावर्तन क्षमता घट सकती है और वह अधिक सौर ऊर्जा सोखने लगती है।अध्ययन के अनुसार लाल शैवाल से ढकी बर्फ साफ सफेद बर्फ की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अधिक सौर ऊर्जा सोख सकती है, जबकि हरी शैवाल से ढकी बर्फ में यह अंतर लगभग 40 प्रतिशत तक हो सकता है। अतिरिक्त ऊर्जा स्थानीय स्तर पर बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने की मुख्य वजह शैवाल हैं। बढ़ता वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन इसके बड़े कारक हैं।
बर्फ-मुक्त इलाकों के विस्तार पर नजर
इस शोध का महत्व केवल बर्फ के रंग में बदलाव समझने तक सीमित नहीं है। यदि शैवाल बर्फ की सतह पर ऊर्जा सोखने की मात्रा को प्रभावित करती हैं, तो बर्फ पिघलने और तटीय क्षेत्रों में बर्फ-मुक्त जमीन के विस्तार का अनुमान लगाते समय इस प्रभाव को भी ध्यान में रखना पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन के कारण पेंगुइन और दूसरे पक्षियों के आवास तथा उनके वितरण में बदलाव आता है, तो नए इलाकों तक पोषक तत्व पहुंचने की संभावना भी बदल सकती है। इससे शैवाल के फैलाव पर असर पड़ सकता है। हालांकि, भविष्य में इस प्रक्रिया का वास्तविक प्रभाव कितना होगा, यह जानने के लिए और अध्ययन जरूरी हैं।
अंटार्कटिका में पेंगुइन की बीट, सूक्ष्म शैवाल और सूर्य की ऊर्जा के बीच का यह संबंध बताता है कि पारिस्थितिकी तंत्र में छोटी-सी दिखने वाली प्रक्रिया भी पर्यावरणीय बदलावों को प्रभावित कर सकती है। वैज्ञानिकों के लिए अब यह समझना अहम होगा कि बदलती जलवायु के बीच यह प्राकृतिक प्रक्रिया बर्फ के भविष्य को किस हद तक प्रभावित कर सकती है।