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जलवायु परिवर्तन की मार: फ्रांस में 70 साल के निचले स्तर पर पहुंच सकता है वाइन उत्पादन, भारत के लिए क्या मौका?

Sun, 20 Sep 2026 04:56 PM IST
राहुल कुमार अमर उजाला नेटवर्क, पेरिस/नई दिल्ली।

सार

फ्रांस की मशहूर वाइन इंडस्ट्री पर जलवायु परिवर्तन का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। तेज गर्मी और सूखे के चलते देश में वाइन उत्पादन लगातार तीसरे साल घटने की आशंका है और यह करीब 70 साल के निचले स्तर तक पहुंच सकता है। हालात ऐसे हैं कि कुछ इलाकों में बेलें उखाड़ने और उत्पादन घटाने के साथ नए बाजार तलाशने की जरूरत महसूस की जा रही है। इस बीच फ्रांस की नजर भारत जैसे उभरते बाजारों पर भी है।
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जलवायु परिवर्तन की चपेट में फ्रांस की मशहूर वाइन इंडस्ट्री । - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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फ्रांस की मशहूर वाइन इंडस्ट्री जलवायु परिवर्तन, भीषण गर्मी और सूखे के दोहरे दबाव में है। फ्रांस के कृषि मंत्रालय के मुताबिक 2026 में देश का वाइन उत्पादन करीब 70 साल के निचले स्तर पर पहुंच सकता है। यह लगातार तीसरा साल होगा जब देश में वाइन उत्पादन में कमी दर्ज होने की आशंका है। विशेषज्ञों के मुताबिक गर्म होती जलवायु ने अब फ्रांस के लगभग किसी भी वाइन क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित नहीं छोड़ा है।

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फ्रेंच वाइन यूनियन की रिपोर्ट के अनुसार बर्गंडी क्षेत्र में ग्रां क्रू अंगूर के बागों के सबसे बड़े मालिकों में शामिल मैसन लुई लातूर के प्रमुख फ्लोरेंट लातूर ने बताया कि इस साल उनके यहां 14 अगस्त से ही अंगूर की कटाई शुरू करनी पड़ी, जो उनके एस्टेट के इतिहास में सबसे जल्दी हुई कटाई है। उनके मुताबिक हर दशक में अंगूर की कटाई का मध्य बिंदु करीब 3 दिन पहले खिसक रहा है। 1930 के दशक की तुलना में अब कटाई का समय लगभग एक महीने पहले आ गया है।जल्दी पकने वाले अंगूर वाइन बनाने वालों के लिए नई मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। उन्हें बेहद कम समय में मजदूरों और अन्य संसाधनों की व्यवस्था करनी पड़ती है। मौसम का अनुमान बदलने के कारण कटाई की तारीख भी तेजी से बदल सकती है।

कहीं सूखा तो कहीं कम उत्पादन, असर पूरे उद्योग पर
फ्रांस के सभी वाइन क्षेत्रों पर जलवायु संकट का असर एक जैसा नहीं है। सीएनबीसी के अनुसार  अपेक्षाकृत ठंडे और समशीतोष्ण इलाकों लोयर वैली और शैंपेन में गर्मी का असर ज्यादा दिखाई दिया है। दूसरी ओर दक्षिणी फ्रांस के बोर्डो और लैंगदॉक-रूसियोन में पिछले साल की तुलना में कुछ क्षेत्रों में अधिक उत्पादन की रिपोर्ट है।बोर्दो विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और आईएनएसईईसी ग्रांद एकोल विश्वविद्यालय में वाइन एवं स्पिरिट्स के चेयर जीन-मैरी कार्देबा का कहना है कि फ्रांस जलवायु परिवर्तन के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं था। उनके अनुसार स्पेन लंबे समय से गर्मी और सूखे का सामना करता रहा है और वहां सिंचाई का नेटवर्क अधिक विकसित है, जबकि फ्रांस में वाइन बागानों में सिंचाई पर कड़े प्रतिबंध हैं और इसकी अनुमति विशेष परिस्थितियों में ही मिलती है।
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पुराने नियमों पर भी उठ रहे सवाल
जलवायु परिवर्तन ने फ्रांस के वाइन उद्योग में दशकों से चले आ रहे कड़े नियमों पर बहस तेज कर दी है। वाइन की गुणवत्ता और क्षेत्रीय पहचान बनाए रखने के लिए लागू एपिलेशन नियमों में अंगूर की किस्म, पौधों की संख्या और सिंचाई जैसी व्यवस्थाएं तय होती हैं।2025 में शातो लाफ्लूर ने अपने 6 वाइन को पोमेरोल और व्यापक बोर्डो आधिकारिक वर्गीकरण से बाहर कर लिया था। एस्टेट के मालिक गिनो परिवार ने कहा था कि मौजूदा नियम बदलते मौसम के अनुसार तेजी से बदलाव करने की क्षमता सीमित करते हैं।

आर्थिक संकट भी गहरा रहा
जलवायु संकट का असर सिर्फ उत्पादन पर नहीं, बल्कि वाइन कारोबार की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है। उत्पादन लागत बढ़ रही है, जबकि कई क्षेत्रों में बिक्री और घरेलू खपत घट रही है। कार्देबा के अनुसार 2019 से 2025 के बीच वाइन क्षेत्र में कारोबार बंद होने के मामले करीब 3 गुना बढ़ गए और 2026 भी चुनौतीपूर्ण वर्ष हो सकता है।फ्रांस की सरकार ने गर्मी और सूखे से प्रभावित किसानों और वाइन उत्पादकों की मदद के लिए गर्मियों के अंत में 1 अरब यूरो से अधिक का आपात सहायता पैकेज घोषित किया।

हजारों हेक्टेयर में बेलें उखाड़ी जा रहीं
वाइन की घटती खपत और उत्पादन संकट के बीच फ्रांस में अंगूर के बागों का क्षेत्र भी कम किया जा रहा है। बोर्डो क्षेत्र में 2023 से अब तक करीब 20,000 हेक्टेयर में अंगूर की बेलें उखाड़ी जा चुकी हैं। इसके बाद वहां बचा वाइनयार्ड क्षेत्र करीब 83,000 हेक्टेयर रह गया है।2026 में सरकारी सहायता योजना के तहत फ्रांस के कुल अंगूर बागान क्षेत्र के करीब 4% हिस्से में बेलें स्थायी रूप से हटाई जा रही हैं। किसानों को इसके लिए प्रति हेक्टेयर 4,000 यूरो तक की सहायता दी जा रही है।

घरेलू खपत में भी बड़ी गिरावट
फ्रांस की वाइन इंडस्ट्री पहले से ही बदलती उपभोक्ता आदतों से जूझ रही है। 1960 में देश की करीब आधी आबादी रोजमर्रा में वाइन का सेवन करती थी, लेकिन 2018 तक यह आंकड़ा 10% से नीचे आ गया।महंगाई और पिछले 5 वर्षों में बढ़ी व्यापारिक बाधाओं ने भी बाजार पर दबाव डाला है। इसके कारण बड़ी मात्रा में वाइन का स्टॉक जमा हुआ है और कई उत्पादकों को उत्पादन घटाने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

अब भारत समेत नए बाजारों पर नजर
फ्रांस की वाइन कंपनियां अब नए उपभोक्ताओं और नए उत्पादों की तलाश कर रही हैं। वाइन उद्योग के विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका नए उत्पादों और अलग तरह की पैकेजिंग के परीक्षण के लिए महत्वपूर्ण बाजार है। दक्षिण अमेरिका, ब्राजील और भारत को भी भविष्य के संभावित बाजारों में देखा जा रहा है।मैसन लुई लातूर के फ्लोरेंट लातूर के मुताबिक युवा पीढ़ी तक पहुंचना भी उद्योग के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाली वाइन को अधिक लोगों की पहुंच में लाने और उसकी कहानी, इतिहास और क्षेत्रीय पहचान को सरल भाषा में समझाने पर जोर दिया जा रहा है।फ्रांस की वाइन इंडस्ट्री के सामने अब चुनौती केवल अंगूर उगाने की नहीं है। बदलती जलवायु, कम होती पैदावार, बढ़ती लागत और बदलते उपभोक्ता व्यवहार ने पूरे कारोबार का मॉडल बदलने की जरूरत पैदा कर दी है। यह संकट यह भी दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन किस तरह दुनिया के पारंपरिक कृषि उत्पादों और उनसे जुड़े अरबों डॉलर के उद्योगों का भूगोल बदल रहा है।

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