पूंजीपति देश अमेरिका के राष्ट्रपति का कम्युनिस्ट मुल्क चीन में स्वागत होना भले ही दुनिया की समझ से परे हो, लेकिन बीजिंग के ऐतिहासिक पैलेस म्यूजियम आज चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग व उनकी पत्नी पेंग लियुआन द्वारा ट्रंप और मिलानिया के जोरदार स्वागत का गवाह बना। हालांकि दोनों देशों के बीच कई विरोधाभासी मुद्दे हैं जिन पर दो महाशक्तियों के बीच चर्चा होनी है लेकिन दोनों के बीच समझौतों की रूपरेखा भी तय हो चुकी है। इनमें बड़े कारोबारी समझौते और कुछ वैश्विक कूटनीति से जुड़े मसले शामिल हैं।
चीन के फारबिडन शहर में दोनों नेताओं ने भले ही चाय की चुस्कियां लेते हुए अपने एजेंडे की शुरूआती चर्चा मीठे अंदाज में की हो, लेकिन दुनिया की निगाहें उन विवादास्पद मसलों पर जमी हुई हैं जो पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच स्वाभाविक खाई बनाए हुए हैं।
इनमें अमेरिका के भीतर चीन का कारोबार, चीन में अमेरिकी व्यवसायियों को स्वतंत्र ट्रेड सुविधा और उत्तरी कोरिया की परमाणु नीति पर दबाव बनाना शामिल है। इनके अलावा हिंद-प्रशांत महासागर और दक्षिण सागर में कारोबारी रास्तों की मौजूदगी पर अधिकार को लेकर भी दोनों महाशक्तियों के बीच कुछ समझौतों की उम्मीद की जा रही हैं, जो बेहद ही संवेदनशील और विवादास्पद हैं।
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ट्रंप यहां तीन दिन की यात्रा पर हैं और उनके साथ बोइंग, गोल्डमैन साक्स, वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक और क्वालकॉम जैसी दिग्गज कंपनियों के शीर्ष अधिकारी भी इन्हीं समझौतों को लेकर मौजूद हैं। इससे पहले गत सप्ताह फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के टिम कुक और माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला भी शी जिनपिंग के साथ दिखाई दिए।
इसका सीधा मतलब है कि अमेरिका किसी भी तरह चीन के बाजार में घुसना चाहता है, जबकि अपने देश में चीनी कंपनियों के लिए स्वतंत्र कारोबारी रास्ते रोकना चाहता है। इसलिए चीन विरोधी रुख के बावजूद ट्रंप पर चीन के साथ समझौतों के लिए दबाव है। जबकि चीन पर भी दुनिया में ओबोर पहल और कारोबार बढ़ाने का दबाव है। इसलिए दोनों के बीच समझौते महत्वपूर्ण हैं।