भारत की राजभाषा और सम्पर्क भाषा हिंदी अब भौगौलिक रूप से विश्व के अनेक देशों में दस्तक दे रही है अब वह प्रवासी व अनिवासी भारतीयों के समूह से निकल कर परदेशियों की जुबान भी बन रही है। चीन में भी हिंदी अध्ययन की जडें अब और गहरी हो रही हैं।
चीन में इस समय नौ से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है, इनमें शंघाई अंतरराष्ट्रीय भाषा विश्वविद्यालय शंघाई, पीकिंग (बीजिंग) विश्वविद्यालय, विदेशी भाषा अध्ययन विश्वविद्यालय पीकिंग (बीजिंग), जनसंचार विश्वविद्यालय बीजिंग, शीआन अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, युन्नान अल्पजाति विश्वविद्यालय, क्वांग्तुंग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, लुओयांग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, सेंनचेन विश्वविद्यालय आदि प्रमुख हैं।
इनमें स्नातक स्तर पर हिंदी मुख्य पाठ्यक्रम के रूप में पढाई जा रही है, इसके अलावा कुछ विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर एवं पीएचडी स्तर पर भी हिंदी में अध्ययन हो रहा है। हिंदी में शिक्षा प्रसार बढ़ने से भारतीय साहित्य और भाषाओं के प्रति विद्यार्थियों और शोधार्थियों की रूचि बढी है। इससे भारत और चीन के नागरिकों के बीच भाषिक लेनदेन तो बढ़ ही रहा है प्रतिवर्ष सैकड़ों नए विद्यार्थियों का हिंदी से जुड़ाव भी हो रहा है। इससे पड़ोसी धर्म की समझ और गहरी होने के साथ-साथ आम लोगों में भी भारत को जानने की रूचि पैदा हुई है।
यद्यपि विदेशों में भी हिंदी प्रचार की कोशिशें निरंतर चल रही हैं। इनमें दूतावास एवं कौंसलावास के स्तर पर हिंदी कक्षाओं में अध्ययन-अध्यापन, कई विश्वविद्यालयों में स्नातक एवं स्नात्कोत्तर स्तर पर अध्ययन-अध्यापन तथा सांस्कृतिक, कार्यक्रमों के आयोजन प्रमुख हैं। जो यहां अक्सर होते रहते हैं। इसमें प्रवासी भारतीयों की विभिन्न शहरों में बनी संस्थाओं का योगदान तो है ही, अनेक व्यावसायिक, व्यापारिक संस्थाएं भी हिंदी प्रचार प्रसार में सहयोगी बन रही हैं।
चीन में अब भारत की समृद्ध साहित्यिक परम्परा का अनुवाद भी हो रहा है, संस्थागत एवं निजी स्तर पर भी अनुवाद कार्य चल रहे हैं। इस प्रकार देश के बाहर हिंदी को अन्य विदेशी भाषाओं के समानांतर खड़ा करने की नीति कारगर हो सकती है।
हिंदी शब्दकोष के पर्याप्त न होने के अनेक उदाहरण समय-समय पर मिलते हैं पर मैं सर्वाधिक तब संकट में पड़ा जब चीनी-अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोष के लिए काम कर रहे मेरे हिंदी विभाग के साथियों ने दैनिक उपयोग के कई शब्दों के लिए हिंदी शब्द पूछे, अंग्रेजी शब्दों को हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं-बोलियों जैसे के तैसे अपनाते रहने के लिए क्षोभ भी अनुभव हुआ।
उदाहरण के लिए अलग-अलग प्रकार के झाडू के लिए कौन से शब्द होंगे फ़र्श पर सफाई वाला, छत व दीवारों की सफाई वाला, घर के बाहर की सफाई, विविध प्रकार की मशीनों, यंत्रों की सफाई के लिए, फिर दांतों की सफाई के लिए, कई तरह के सफाई यंत्रों के लिए अंग्रेजी शब्द केवल ब्रुस का सामान्य प्रयोग दिखाई दिया। हिंदी में यह संकट दैनिक प्रयोग की वस्तुओं से लेकर वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली में साफ दिखाई देता है, जाहिर है हिंदी शब्दकोष को भी अपनी जड़ों से सींचने की जरूरत है।
हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री एवम उनके अनेक मत्रिमंडल के सदस्यों द्वारा देश के बाहर भी अपने देश की भाषा हिंदी में बोलने से हिंदी के कमजोर होने अथवा उच्चवर्ग में हिंदी को लेकर असमंजस कम तो हुआ है पर देश के भीतर अलग अलग राज्यों में अकारण होने वाली हिंदी विरोध की घटनाओं से राजनीतिक विरोध का जो विश्व में संदेश जाता है वह वास्तव में दिशाभ्रम पैदा करने वाला है।
इससे वैश्विक स्तर पर विरोधाभासी संदेश जाते हैं, यह भाषा नीति के लिए भी विचार करने का समय है। चीन जैसे विस्तृत भौगोलिक भूभाग वाले एवं अनेक बोली, भाषाओं वाले देश में राष्ट्रीय एकता के लिए एक भाषा के महत्व को समझा जा सकता है इस प्रयोग को भारत में संवैधानिक प्रावधानों के साथ लागू कर देश की अखंडता और एकता की भी स्वाभाविक नींव डाली जा सकती है।
चीन की एक भाषा मंदारिन चीनी भाषा का यह सूत्र यह मेरे लिए एक नई खिड़की खोलने वाला विचार था और पिछले छ माह में यह बात मुझे और स्पष्ट होती गई है।
चीन में उनकी भाषा मंदारिन शिक्षा, सूचना तथा संचारक्रांति का माध्यम बन चुकी है। इनमें हांगकांग जैसे क्षेत्र भी हैं, जो देर से चीनी भूभाग के हिस्से बने, लेकिन आज पूरी तरह से चीनी नीति का पालन कर रहे हैं।
वर्षों से शंघाई में रहते हुए कई अन्य भूभागों से आए चीनी नागरिकों के लिए शंघाई की बोली शंघाईयन समझने में कठिनाई होती है, यह समझने में भारत के विविध भाषा भाषी समाज जैसा ही लगता है कि सुदूर प्रांतों के निवासी स्थानीय बोली प्रयोगों को आसानी से नहीं समझ पाते, पर लिखित रूप में एक ही भाषा के प्रयोगकर्ता होने के कारण उनकी कठिनाई दूर हो जाती है।
इसका बड़ा कारण है चीनी में दी जाने वाली शिक्षा जो पूरे देश में एक ही माध्यम है, भारत में भी अगर हिंदी को कोई मुकाम दिलाना है तो उसे भी इसी तरह लागू करने की आवश्यकता है।