चीन चाहता है कि भारत समेत अन्य ब्रिक्स राष्ट्र उसके 'साइबर संप्रभुता' के विचार को स्वीकार करें, जिसके बाद ये सभी देश एक ऐसे साइबर स्पेस का नियंत्रण कर सकेंगे, जिसमें दूसरे देश हस्तक्षेप नहीं कर पाएंगे। इसी साल चीन में होने वाली अगली ब्रिक्स मीटिंग में इस बात के लिए प्रस्ताव रखा जा सकता है।
चीनी विदेश मंत्रालय के साइबर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि इस साल ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी कर रहा चीन, रुस और भारत समेत बाकी सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम करना चाहता है।
हालांकि, चीन का 'साइबर संप्रभुता' का विचार उसकी अपनी विचारधारा से अलग नजर आता है। इसके लिए उसे इंटरनेट की स्वतंत्रता लागू करनी होगी। गौरतलब है कि चीन नें गूगल, फेसबुक और ट्विटर जैसी साइट्स प्रतिबंधित हैं।
चीन में बैन है कई वेबसाइट्स, क्या है वजह
चीन
गौरतलब है कि भारत का अधिकांश आईटी सेक्टर पश्चिमी मार्केट पर निर्भर करता है, जहां इटरनेट मुख्य तौर पर मुफ्त है। इसी वजह से वो चीन के इस प्रस्ताव में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिख सकता। चीन ब्रिक्स के अलावा एससीओ (शंघाई सहयोग समझौते) के सदस्यों के बीच भी अपने इस प्रस्ताव रखेगा। चीन, रूस और मध्य एशियाई राष्ट्र एससीओ के सदस्य हैं। इस समूह में भारत और पाकिस्तान निरिक्षक है, जिन्हें फुल टाइम सदस्य बनाया जा सकता है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारत को फुट टाइम मेंबर बनाने से एसीएस क्षेत्र में आर्थिक विकास तेजी से होगा। चीन दूसरे देशों की सरकारों और संयुक्त राष्ट्र समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को अपनी 'साइबर संप्रभुता' के विचार पर मनाने की कोशिश कर रहा है। इस विचार के अनुसार हर देश अपनी इच्छानुसार इंटरनेट को चला सकेगा, किसी दूसरे राष्ट्र के हस्तक्षेप के बिना।
चीनी अधिकारियों का मानना है कि चीन में इंटरनेट की पूरी स्वतंत्रता है और राष्ट्र सुरक्षा के मद्देनजर चुनिंदा वेबसाइट्स ही बैन हैं। हालांकि, अधिकारी यह नहीं समझा पाए कि यह वेबसाइट्स चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा कैसे हैं।