पीपल्स रिपब्लिक चाइना यानी चीन एक ऐसा राष्ट्र है जिसके अपने छोटे से उत्तर-पूर्वी पड़ोसी मुल्क के साथ गहरे संबंध हैं। इसकी एक वजह दोनों के बीच हुई संधि की प्रतिबद्धता भी है। उत्तर कोरिया इकलौता देश है जिसकी चीन के साथ यह संधि है। इसके तहत दोनों राष्ट्रों को एक-दूसरे की सहायता करना ज़रूरी है। इस संधि पर जुलाई 1961 में हस्ताक्षर हुए थे और इसमें केवल सात अनुच्छेद हैं।
इसका दूसरा अनुच्छेद बेहद अहम है। इसमें लिखा है, "हस्ताक्षर करने वाले दोनों पक्ष संयुक्त रूप से इस पर सहमत हैं कि किसी भी देश द्वारा होने वाली कैसी भी आक्रामकता को रोका जाएगा।"
युद्ध की स्थिति में भी करने होगी मदद
इसमें आगे कहा गया है कि अगर एक पक्ष पर कोई राष्ट्र या कई राष्ट्र मिलकर हमला करते हैं और वह युद्ध में शामिल हो जाता है तो दूसरा पक्ष इसको समाप्त करने के लिए तुरंत सेना और दूसरे साधनों से मदद करेगा।
पढ़ें:- परमाणु परीक्षण के बाद उत्तर कोरिया की धमकी- गिफ्ट पैकेज के लिए तैयार रहे अमेरिका
संक्षेप में समझा जाए तो अगर उत्तर कोरिया पर अमेरीका या दक्षिण कोरिया हमला करता है तो चीन का क्या पक्ष होगा, उसका जवाब इस अनुच्छेद से ज़रूर मिल जाता है। इस संधि के अनुसार एक पक्ष दूसरे पक्ष के युद्ध में शामिल होने के लिए बाध्यकारी है। इन तरीकों से पता चलता है कि इतिहास दो पक्षों के बीच संबंध को आगे बढ़ाता है।
युद्ध में शामिल हुआ था चीन
इसके अलावा और भी मिसालें हैं। इस संधि से पहले 1950 में चीन ने कोरियाई युद्ध में संयुक्त राष्ट्र की सेना के उतरने के बाद अपने लाखों सैनिक उतार दिए थे। उत्तर कोरिया की रक्षा और मध्यवर्ती क्षेत्र के लिहाज़ से एक बड़ी सैन्य संपत्ति थी। यह संधि अभी भी अस्तित्व में है। हालांकि, जब इस पर हस्ताक्षर किया गया था तब से अब तक चीन में भारी बदलाव आ चुका है।
पढ़ें:- रूस ने कहा, उत्तर कोरिया घास खा लेगा, लेकिन परमाणु कार्यक्रम नहीं छोड़ेगा
1976 में चीन के शासक माओ की मौत के बाद इस राष्ट्र ने समाजवाद के एक आदर्शवादी संस्करण का पालन करते हुए इसमें बड़ा सुधार किया। इसी के परिणामस्वरूप आज चीन की प्रणाली बेहद जटिल है। इसकी अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक महत्व बढ़ा है। उत्तर कोरिया के लिए चीज़ें काफ़ी अलग हो गई हैं। तेज़ प्रयासों के बावजूद पिछले तीन दशकों में नियंत्रित सुधारों में बहुत कम सफ़लता मिली है।