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क्या मायने हैं नेपाल की राजनीति में चीन के सीधे दखल के?

Sun, 27 Dec 2020 03:51 PM IST
अनवर अंसारी वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
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केपी शर्मा ओली और शी जिनपिंग - फोटो : social media
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नेपाल के सियासी हालात पर चीन ने अब खुलकर हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है। जब से नेपाल में कम्युनिस्ट सरकार बनी तब से विकास के नाम पर चीनी दखल वैसे भी काफी बढ़ गया था लेकिन अब संसद भंग होने के बाद से चीन ने पहले अपने राजदूत के जरिए राष्ट्रपति और अन्य नेताओं पर दबाव डलवाया और अब रविवार को अपना चार सदस्यों का दल यहां भेजा। ये चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अंतरराष्ट्रीय विभाग के उप मंत्री गुआ येझाउ के नेतृत्व में यहां आया है। इतना उच्च स्तरीय दल भेजने के चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के फैसले से जाहिर है कि चीन नेपाल की राजनीति को अपने हितों की विपरीत दिशा में नहीं जाने देना चाहती है।

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बताया जाता है कि चीन को सबसे ज्यादा परेशानी प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के रुख से हुई है। ओली पर कुछ महीने पहले तक आरोप लग रहे थे कि वे चीन के हाथ में खेल रहे हैं। लेकिन पिछले अक्तूबर से भारत के बड़े अधिकारियों की नेपाल यात्रा के साथ उनके रुख में बदलाव देखा गया। इसकी सबसे बड़ी मिसाल पिछले विजय दशमी को देखने को मिली, जब ओली ने अपनी ही सरकार की तरफ से जारी किए गए नेपाल के नए नक्शे को छोड़कर देश का पुराना नक्शा ट्वीट किया। नए नक्शे में भारत के कई इलाकों को नेपाल की सीमा के अंदर दिखाया गया था। बताया जाता है कि उसके बाद से ओली चीन की मर्जी के खिलाफ काम करते रहे हैं।   


भारत की वरिष्ठ अधिकारियों की नेपाल यात्रा के बाद पिछले 29 नवंबर को चीन ने अपने रक्षा मंत्री वेई फेनझे को नेपाल भेजा था। इसके दो दिन पहले ही भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला की नेपाल यात्रा पूरी हुई थी। स्थानीय मीडिया की खबरों के मुताबिक इस बीच चीन लगातार अपने काठमांडू दूतावास और अधिकारियों के जरिए नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के संपर्क में था। लेकिन ओली के संसद भंग कराने के फैसले की भनक उसे नहीं लग सकी। अचानक हुए इस एलान से यहां चीनी दूतावास और बीजिंग में चीन के अधिकारी भौंचक रह गए।
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नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने स्वीकार किया है कि नेपाल में चीन की गहरी रुचि है। यहां के अखबार काठमांडू पोस्ट से बातचीत में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की स्थायी समिति के एक सदस्य ने कहा कि पिछले कुछ महीनों में भारतीय अधिकारियों की नेपाल यात्रा से चीन चिंतित था। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में चल रहे अंदरूनी टकराव को लेकर भी उसने अपनी चिंता यहां के कम्युनिस्ट नेताओं को बताई थी। इसी बीच अचानक ओली ने संसद के निचले सदन को भंग करा दिया। इसका फौरी असर यह हुआ कि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी विभाजित हो गई।

विश्लेषकों का कहना है कि चीन की प्राथमिकता नेपाल में राजनीतिक स्थिरता कायम करने की है। नेपाल में अस्थिरता को वह अपनी सुरक्षा के लिए एक चुनौती के रूप में देखता है। चाइना स्टडी ग्रुप नामक थिंक टैंक के अध्यक्ष सुंदर नाथ भट्टराई ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा कि चीन भविष्य में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में एकता कायम करने की संभावना का पता लगाना चाहता है।

दूसरे जानकारों का कहना है कि पिछले छह दशक में नेपाल में चीन की इतनी सक्रियता कभी नहीं देखी गई। लेकिन 2018 में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद धीरे- धीरे चीन ने अपनी सक्रियता बढ़ाई है। पिछले साल सितंबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने काठमांडू की यात्रा की थी। उसके एक महीना पहले नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘शी जिनपिंग थॉट’ (शी जिनपिंग के विचार) पर एक सेमीनार का आयोजन किया था।

इस साल चीन की राजदूत हाउ यांगछी लगातार कम्युनिस्ट नेताओं से मिलती रहीं। लेकिन दिसंबर में हुई घटनाओं का भनक उन्हें नहीं था। जानकारों का कहना है कि चीन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर हर छोटी-मोटी बात के प्रबंधन में शामिल नहीं था। लेकिन उसे यह अंदाजा नहीं था कि पार्टी टूट जाएगी। ऐसा अचानक हुआ, जिससे वह नाखुश है। इसीलिए उसने इतने ऊंचे स्तर पर हस्तक्षेप का फैसला किया है।

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