चीन की सरकार को 50 साल पहले हुई माओ की क्रांति दोबारा लौटने का डर सता रहा है। जिसके लिए अब गांवों में कम्युनिस्ट वॉलंटियर्स को भेजने की योजना बनाई जा रही है।
2022 तक एक करोड़ वॉलंटियर्स के ग्रामीण इलाकों में पहुंचने का वादा कम्युनिस्ट यूथ लीग (सीवाईएल) ने किया है। इन वॉलंटियर्स को लोगों का कौशल बढ़ाने, सभ्यता को बढ़ावा देने और लोगों का झुकाव विज्ञान-तकनीक के प्रति बढ़ाने के लिए भेजा जाएगा।
क्या थी माओ की सांस्कृतिक क्रांति?
माओत्से तुंग की सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत 1966-76 के दौरान हुई थी। इस क्रांति को लेकर माओ ने घोषणा की थी कि बुर्जुआ वर्ग कम्युनिस्ट पार्टी में अपना प्रभाव कायम कर तानाशाही स्थापित करना चाहता है। माना जाता है कि माओ ने प्रतिद्वंद्वियों से अपनी पार्टी को छुटकारा दिलाने के लिए सांस्कृतिक क्रांति का इस्तेमाल किया था।
माओ और उनके समर्थकों ने हजारों रेड गार्डों को एकत्रित किया। इन सभी से चीनी समाज के चार स्तंभों को खत्म करने को कहा गया था। ये चार पुराने स्तंभ थे, पुराने रिवाज, तौर-तरीके, संस्कृति और पुरानी सोच।
चीन में सोशल मीडिया पर इस क्रांति को लेकर डर जताया जा रहा है। सोशल मीडिया यूजर वांग तिंग यू ने लिखा है, "क्या हम ये सब दोबारा शुरू करने जा रहे हैं।" वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा है, "ऐसी क्रांति तो हम 40 साल पहले देख चुके हैं।"
वहीं देश के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी माओ से काफी प्रभावित रहे हैं। बताया जाता है कि आज भी उनके मन में माओ के समय की यादें ताजा हैं। वह अपने जीवन के सात साल शांसी के एक गरीब गांव में गुजार चुके हैं।
सीवाईएल का कहना है कि सांस्कृतिक क्रांति के पुराने गढ़ काफी गरीबी से जूझ रहे हैं। वॉलंटियर्स भेजे जाने के मामले में अल्पसंख्यक वाले इलाकों को प्राथमिकता में रखा जाएगा। हान बहुसंख्यकों और तिब्बतियों-उइगरों के बीच संबंध हमेशा ठीक नहीं रहते हैं। इन ग्रामीण इलाकों में गर्मियों की छुट्टियों में युवाओं के भेजा जाएगा।