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US: अमेरिकी सांसद बोले- चीन से पैदा खतरा भारत-अमेरिका संबंधों के लिए अवसर, एफटीए सहित मजबूत समझौतों की जरूरत

Tue, 30 Jan 2024 04:48 PM IST
निर्मल कांत वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन

सार

US: कैलिफोर्निया से रिपब्लिकन सांसद इस्सा ने कहा कि भारत और अमेरिका के संबंध आज चीन के खतरे पर आधारित नहीं लगते हैं। उन्होंने कहा, मैं चीन के खतरे को एक अवसर के रूप में देखता हूं।
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थिंक टैंक हडसन इंस्टीट्यूट में बातचीत करते डेरेल इस्सा और अपर्णा पांडे। - फोटो : एक्स/हडसन इंस्टीट्यूट
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विस्तार
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चीन से पैदा खतरा भारत और अमेरिका के लिए अवसर है कि वे एक मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) सहित मजबूत समझौते करें और दोनों देश एक-दूसरे पहले साझेदार के रूप में देखें। यह बात एक अमेरिकी सांसद डेरेल इस्सा ने कही। वह थिंक टैंक हडसन इंस्टीट्यूट में भारत और दक्षिण की रिसर्च फेलो अपर्णा पांडे के साथ बातचीत कर रहे थे। 

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कैलिफोर्निया से रिपब्लिकन सांसद इस्सा ने कहा कि भारत और अमेरिका के संबंध आज चीन के खतरे पर आधारित नहीं लगते हैं। उन्होंने कहा, मैं चीन के खतरे को एक अवसर के रूप में देखता हूं। ईसा ने आगे कहा कि जिन वस्तुओं का उत्पादन चीन में किया जाता है, उसी लागत पर भारत में भी वस्तुओं का उत्पादन किया जा सकता है।  

इस्सा ने आगे कहा, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि दोनों देश हकीकत में मजबूत समझौते करें। जिसमें, मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) भी शामिल हो। ताकि, भारत और अमेरिका एक-दूसरे को पहले साझेदार के तौर पर देखें। मुझे लगता है कि हम यह करने की दिशा में एक लंबा रास्ता तय कर चुके हैं। 

थिंक टैंक हडसन इंस्टीट्यूट में बातचीत करते डेरेल इस्सा और अपर्णा पांडे। - फोटो : एक्स/हडसन इंस्टीट्यूट
अमेरिका-दक्षिण एशिया संबंधों पर इस्सा ने कहा, अमेरिका में हमारी सबसे बड़ी और सबसे सफल कंपनियों को चलाने वाले लोग कौन हैं? अमेरिका में प्रवर्तक (इनोवेटर्स) कौन हैं? हमारे विश्वविद्यालयों पर किसका दबदबा है? इसका स्पष्ट जवाब है- भारतीय छात्रों का। उन्होंने आगे कहा, भारतीय छात्र अमेरिका में रहना चाहते हैं। जबकि, चीन अपने अपने छात्रों को वापस अपने देश ले जाना चाहता है। उन्होंने कहा कि वह बीते बीस वर्षों आव्रजन (इमिग्रेशन) सुधार पर काम कर रहे हैं और उन्होंने देखा है कि उन भारतीय लोगों के लिए एच-1बी और अन्य अस्थायी वीजा कार्यक्रम सबसे बड़ी चुनौती है, जो (अमेरिका के) स्थायी निवासी और नागरिक बनना चाहते हैं। 

उन्होंने आगे कहा, जो भारतीय निवेशक अपने एल-1 वीजा का विस्तार करना चाहते हैं, वे अधिक मात्रा में अमेरिका में निवेश करना चाहते हैं। ये वे लोग हैं, जो भारत और अमेरिका का मेल-जोल चाहते हैं। वे हकीकत में अमेरिका में अपने पैर जमाना चाहते हैं। 

उन्होंने एफटीए की वकालत करते हुए कहा कि ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा.. सभी के लगातार मुक्त व्यापार समझौते बढ़े हैं। इन देशों के तकनीकी को साझा करने के लिए आपस में समझौते हैं। उनके पास ऐसी कंपनियां भी हैं, जिनके एक-दूसरे के देशों में मुख्यालय हैं और कारोबार कर रहे हैं।  
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थिंक टैंक हडसन इंस्टीट्यूट में बातचीत करते डेरेल इस्सा और अपर्णा पांडे। - फोटो : एक्स/हडसन इंस्टीट्यूट
इस्सा ने आगे कहा, क्या हम (भारत-अमेरिका) बराबर के भागीदार हैं? नहीं, हम नहीं हैं। हमारे यहां ज्यादा पैसा है। आपके यहां लोग अधिक हैं। हमारे यहां ज्यादा लोग वकील बनना चाहते हैं और आपके यहां अधिक लोग इंजीनियर बनना चाहते हैं। उन्होंने कहा, भारत और अमेरिका कई समान मूल्यों को साझा करते हैं। लेकिन, कार्य नैतिकता और शिक्षा नैतिकता को काफी अलग तरीके से देखते हैं। अमेरिका की कमी को भारत के साथ साझेदारी से पूरा किया जा सकता है। उन्होंने कहा, मैं एक दुनिया (वन वर्ल्ड) में भरोसा नहीं करता है। मेरा मानना है कि दुनिया साझेदारी से बनी है।  
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