म्यांमार में सैनिक तख्ता पलट के खिलाफ सख्त रुख ना अपनाने की चीन को महंगी कीमत चुकानी पड़ रही है। म्यांमार की जनता में अब चीन विरोधी भावनाएं चरम पर हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसकी कीमत चीन को लंबे समय तक चुकानी पड़ेगी।
गौरतलब है कि एक मौके पर चीन ने तख्ता पलट को म्यांमार में सरकार परिवर्तन बता दिया था। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पश्चिमी देशों की तरफ से सैनिक शासकों के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव को चीन और रूस ने पारित नहीं होने दिया। इनके अलावा कई और वजहें हैं, जिनसे यहां लोगों की नाराजगी बढ़ी है। म्यांमार की जनता में चीन के खिलाफ अब तेज आक्रोश फैला हुआ है। यहां चीनी दूतावास के सामने हजारों लोग प्रदर्शन कर चुके हैं। इसके अलावा चीनी कंपनियों को भी लोगों ने निशाना बनाया है।
चीनी कंपनियों पर हमले होने पर चीन ने म्यांमार के सुरक्षा बलों से हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की। इससे यहां गुस्सा और भड़क गया। तब से यहां सोशल मीडिया पर चीन को लोगों ने खलनायक के रूप में पेश किया जा रहा है। इस बात का बार-बार जिक्र किया जा रहा है कि चीन को सेना विरोधी प्रदर्शनकारियों की जान से ज्यादा अपनी कंपनियों की संपत्ति की चिंता है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि अब म्यांमार की जनता में दीर्घकालिक चीन विरोधी भावनाएं घर कर सकती हैं। इससे यहां चल रही उसकी परियोजनाओं को नुकसान हो सकता है।
वेबसाइट एशिया टाइम्स पर छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन विरोधी गुस्से को देखते हुए म्यांमार में रहने वाले चीनी समुदाय के लोग भयभीत हैं। इस समुदाय के लोगों की यहां बड़ी संख्या है। यहां बने माहौल के कारण स्थानीय चीनी समुदाय ने सार्वजनिक बयान जारी कर कहा है कि वे तख्ता पलट विरोधी आंदोलन का समर्थन करते हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि उनका चीन से कोई संबंध नहीं है।
वैसे यहां के कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि म्यांमार की जनता में चीन के खिलाफ फूटा गुस्सा सिर्फ इसलिए नहीं है कि चीन ने तख्ता पलट का विरोध नहीं किया। बल्कि इसकी वजह लोगों में वर्षों से गहराती गई ये शिकायत है कि चीन म्यांमार के प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहा है। उसकी परियोजनाओं की वजह से यहां जंगल काटे गए हैं और लकड़ी का कारोबार बढ़ा है।
इन पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि चीन के खिलाफ देश में पहले प्रदर्शनों का दौर 2011 में आया था, जब चीन और म्यांमार के बीच कचिन प्रांत में पनबिजली परियोजना के लिए एक करार हुआ था। उस परियोजना के कारण हजारों वर्ग किलोमीटर में जंगल डूबने की आशंका थी। साथ ही करार में प्रावधान था कि बनने वाली 90 फीसदी बिजली चीन को निर्यात की जाएगी। तब जन विरोध के कारण तत्कालीन सरकार को उस परियोजना को स्थगित करना पड़ा था।
उसके बाद मांडले में तांबा खनन की चीन-म्यांमार संयुक्त परियोजना के विरोध में आंदोलन हुआ। उस परियोजना के कारण कई बौद्ध धार्मिक स्थलों के लिए खतरा पैदा होने का अंदेशा था। इसी तरह चीन के दक्षिणी प्रांत यूनान को म्यांमार के रखाइन प्रांत से जोने वाली हाई स्पीड रेल परियोजना का भी स्थानीय समुदाय कड़ा विरोध करते रहे हैं। गौरतलब है कि इन ज्यादातर परियोजनाओं में म्यांमार की तरफ से वे कंपनियां शामिल हुई हैं, जिनका संबंध सेना या सैनिक अधिकारियों से है।
सैनिक तख्ता पलट के बाद म्यांमार में ये अफवाह फैली रही है कि सेना विरोधी प्रदर्शन के दमन में मदद देने के लिए चीनी विशेषज्ञ और चीनी फौजी टुकड़ियां यहां आई हैं। सोशल मीडिया पर ये चर्चा भी रही है कि चीन ने सैनिक शासकों को निगरानी उपकरण और सैन्य साजो-सामान भी उपलब्ध कराए हैं। सैनिक शासकों ने इस चर्चाओं को पूरी तरह अफवाह बताया है। लेकिन आमजन के भीतर इस कारण चीन के प्रति अविश्वास गहराता चला गया है।
ताइवान के एक टीवी चैनल ने कुछ समय पहले ये खबर दिखाई थी कि तख्ता पलट से ठीक पहले चीन ने म्यांमार से लगी सीमा पर अपने 12 हजार सैनिकों की तैनाती की। इसका यह मतलब निकाला गया है कि चीन को पहले से तख्ता पलट होने की सूचना थी। चीन ने ऐसी सूचनाओं से पैदा हुए शक का निवारण करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की है। इसका उसे यहां लंबे समय तक नुकसान उठाना पड़ सकता है।