पनामा के सुप्रीम कोर्ट की तरफ से सुनाए गए एक फैसले से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पनामा नहर पर वर्चस्व कायम करने के चीनी मंसूबों को झटका लगा है। पनामा के सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार देर रात अपने एक फैसले में पनामा नहर के दोनों छोरों पर बंदरगाह के संचालन के लिए हांगकांग की कंपनी को दी गई छूट को असांविधानिक बताया। इससे रणनीतिक रूप से अहम जलमार्ग पर चीनी प्रभाव को रोकने की अमेरिकी कोशिश को बल मिलेगा।
चीनी कंपनी ने फैसले पर जताई नाराजगी
- पनामा के सुप्रीम कोर्ट के बयान में इस बारे में कोई दिशा-निर्देश नहीं दिया गया है कि अब बंदरगाहों का क्या होगा। सीके हचिसन की सहयोगी चीनी कंपनी पनामा पोर्ट्स कंपनी ने कहा कि उसे अभी तक इस फैसले के बारे में सूचित नहीं किया गया है। हालांकि, उसने जोर देकर कहा कि उसकी रियायत पारदर्शी अंतरराष्ट्रीय बोली का नतीजा थी।
- कंपनी ने बयान में कहा कि यह फैसला कानून पर आधारित नहीं है। यह न केवल पीपीसी और उसके अनुबंध को खतरे में डालता है बल्कि उन हजारों पनामानियाई परिवारों की भलाई और स्थिरता को भी खतरे में डालता है जो प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से बंदरगाह की गतिविधि पर निर्भर हैं।
- कंपनी ने फैसले की आलोचना करते हुए कहा, यह फैसला देश में कानून के शासन और कानूनी निश्चितता को भी खतरे में डालता है। कंपनी ने कहा कि वह पनामा या कहीं और कानूनी कार्रवाई करने के सभी अधिकार सुरक्षित रखती है।
ऑडिट के बाद आया फैसला
कोर्ट का यह फैसला पनामा के कंट्रोलर की तरफ से किए गए ऑडिट के बाद आया। इसमें 2021 में दी गई छूट के 25 साल के विस्तार में गड़बड़ियों का आरोप लगाया गया था।
पनामा नहर पर चीन के प्रभाव को रोकना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकताओं में शुमार है। अमेरिकी विदेश मंत्री के तौर पर मार्को रूबियो अपनी पहली यात्रा पर पनामा पहुंचे थे।
पनामा सरकार के संचालन में चीन के दखल न होने की बात पर रूबियो ने साफ कर दिया था कि अमेरिका इन बंदरगाहों के संचालन को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला मानता है।
पनामा नहर क्यों है अहम, जिस पर कब्जे से घबराया अमेरिका
पनामा नहर वैश्विक भू-राजनीति में अहम मानी जाती है। यह 82 किलोमीटर लंबी नहर अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ती है। पूरी दुनिया का छह फीसदी समुद्री व्यापार पनामा नहर से ही होता है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था के लिए भी पनामा नहर बेहद अहम है क्योंकि अभी न्यूयॉर्क से सैन फ्रांसिस्को जाने वाले मालवाहक जहाजों को पनामा नहर के जरिए दूरी 8370 किलोमीटर पड़ती है, लेकिन अगर पनामा नहर की बजाय पुराने मार्ग से माल भेजा जाए तो जहाजों को पूरे दक्षिण अमेरिकी देशों का चक्कर लगाने के बाद सैन फ्रांसिस्को जाना होगा और ये दूरी 22 हजार किलोमीटर से ज्यादा होगी।
अमेरिका का 14 फीसदी व्यापार पनामा नहर के जरिए ही होता है। कह सकते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए ही पनामा नहर लाइफलाइन का काम करती है। अमेरिका के साथ ही दक्षिण अमेरिकी देशों का बड़ी संख्या में आयात-निर्यात भी पनामा नहर के जरिए ही होता है। एशिया से अगर कैरेबियाई देश माल भेजना हो तो जहाज पनामा नहर से होकर ही गुजरते हैं। खुद पनामा की अर्थव्यवस्था इस नहर पर निर्भर है और पनामा की सरकार को पनामा के प्रबंधन से ही हर साल अरबों डॉलर की कमाई होती है। पनामा नहर पर कब्जा होने की स्थिति में पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंख्ला बाधित होने का खतरा है।
पनामा नहर का निर्माण साल 1881 में फ्रांस ने शुरू किया था, लेकिन इसे साल 1914 में अमेरिका द्वारा इस नहर के निर्माण को पूरा किया गया। इसके बाद पनामा नहर पर अमेरिका का ही नियंत्रण रहा, लेकिन साल 1999 में अमेरिका ने पनामा नहर का नियंत्रण पनामा की सरकार को सौंप दिया। अब इसका प्रबंधन पनामा कैनाल अथॉरिटी द्वारा किया जाता है। पनामा नहर को इंजीनियरिंग का चमत्कार माना जाता है और इसे आधुनिक दुनिया के इंजीनियरिंग के सात अजूबों में से एक माना जाता है।
चीन की पनामा नहर पर नजर
पनामा नहर को लेकर पर्दे के पीछे चीन और अमेरिका के बीच तनातनी चल रही है। इसे लेकर दोनों देशों में तनाव बढ़ रहा है। चीन अपनी बढ़ती आर्थिक ताकत के जरिए पूरी दुनिया के जलमार्गों पर अपना प्रभाव बढ़ाने में जुटा है। बीते दिनों अमेरिकी नौसेना के एक शीर्ष अधिकारी ने चिंता जाहिर की थी कि चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के जरिए लगातार पनामा नहर पर अपना राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ा रहा है। पनामा में अमेरिका की राजदूत मार्ल कारमन अपोंटे ने भी चीन के पनामा नहर पर बढ़ते प्रभाव पर नाराजगी जाहिर की थी और कहा था कि अमेरिका नहीं चाहता कि ऐसी स्थिति पैदा हो, जिसमें पनामा को अमेरिका और चीन में से किसी एक को चुनने का विकल्प बचे।