बीजिंग में रविवार से चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी की तीन दिवसीय वार्षिक बैठक शुरू होने जा रही है, जिसमें देश की नई 15वीं पंचवर्षीय योजना (2026-2030) पर चर्चा होगी। इस बैठक का एजेंडा बेहद व्यापक है। इसीलिए इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति, वैश्विक सामरिक स्थिति और सेना में जारी भ्रष्टाचार विरोधी अभियान पर भी विचार किया जाएगा। ये बैठक 20 से 23 अक्तूबर तक चलेगी।
पार्टी की 370 सदस्यीय केंद्रीय समिति इस दौरान चीन की धीमी होती अर्थव्यवस्था, घटती घरेलू खपत, ई-वाहनों के अत्यधिक उत्पादन, और ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए नए निर्यात प्रतिबंधों व टैरिफ युद्ध के प्रभावों का विश्लेषण करेगी। बैठक में रोजगार सृजन और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिक लक्ष्य बनाए जाने की उम्मीद है, क्योंकि देश में युवाओं में बेरोजगारी दर 20% तक पहुंच चुकी है।
सेना पर शिकंजा कसने की तैयारी
बैठक से ठीक पहले राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सेना में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई की है। उन्होंने दो शीर्ष जनरल हे वेडॉन्ग और मियाओ हुआ को पार्टी और सैन्य सेवा से निष्कासित कर दिया है। रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता कर्नल झांग शियाओगांग ने बताया कि सात अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को भी गंभीर अनुशासन उल्लंघन और भ्रष्टाचार के आरोप में निष्कासित किया गया है।
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सत्ता में जिनपिंग का दबदबा
शी जिनपिंग 12 वर्षों से सत्ता में हैं और इस दौरान उन्होंने पार्टी और सेना दोनों में व्यापक साफ-सफाई अभियान चलाया है। पिछले एक दशक में एक मिलियन से अधिक अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है, जिसे विशेषज्ञ शी की सत्ता को और मजबूत करने की रणनीति मानते हैं।
वैश्विक परिदृश्य पर भी होगी चर्चा
बैठक में गाजा संघर्ष में युद्धविराम, यूक्रेन में रूस पर दबाव, और अमेरिका की नई सामरिक नीति पर भी विचार किया जाएगा। ट्रंप और शी जिनपिंग जल्द ही दक्षिण कोरिया में होने वाले एपीईसी शिखर सम्मेलन में आमने-सामने मिल सकते हैं। दोनों देशों के बीच टिकटॉक और रेयर अर्थ मेटल्स को लेकर बढ़ते विवादों के बावजूद नई व्यापार वार्ता भी चल रही है।
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भारत और रूस से संबंधों पर भी नजर
बैठक ऐसे समय में हो रही है जब हाल ही में चीन ने तिआनजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शामिल हुए थे। यह मोदी का सात साल बाद चीन दौरा था। इस मुलाकात को दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने की दिशा में अहम माना गया है, खासकर जब अमेरिका और भारत के बीच तेल आयात को लेकर मतभेद बढ़े हैं।