चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और श्रीलंका के पीएम महिंदा राजपक्षे।
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चीन ने श्रीलंका में अपने पैर तेजी से पसारने की कोशिश शुरू कर दी है। इसी मकसद से उसने अब इस द्वीप देश के उन इलाकों को प्रभावित करने की कोशिश शुरू की है, जिन पर वह अब तक ध्यान नहीं देता था। हाल ही में सामने आया है कि श्रीलंका में चीन के राजदूत की झेनहोंग ने क्रिसमस से ठीक पहले उत्तरी प्रांत में स्थित तमिल बहुल क्षेत्र का दौरा किया था। चीनी दूतावास ने दिसंबर 15 को शुरू हुए राजदूत के इस तीन दिवसीय दौरे को श्रीलंका को जानने के मकसद से अहम बताया था।
तब चीनी दूतावास की तरफ से जारी हुए बयान में कहा गया था, "यह उत्तर का एक स्टडी टूर था, जिसकी योजना काफी पहले बना ली गई थी, लेकिन कोरोनावायरस महामारी के चलते यह दौरा लगातार टल रहा था।" चीन के इस बयान को लेकर कूटनीतिक जानकारों का अलग मत है। उनका कहना है कि चीन इन दौरों के जरिए ही श्रीलंका में अपने पैर पसारने की कोशिश कर रहा है। एक पॉलिसी रिसर्च ग्रुप पोरेग ने इस संबंध में लेख भी प्रकाशित किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चीन अब श्रीलंका को अपनी बेल्ट एंड रोड परियोजना (BRI) के तहत रणनीतिक दृष्टि से अहम ठिकाना बनाना चाहता है। उसकी मंशा केवल यहीं तक नहीं है, बल्कि वो इसके जरिए हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी और भारत पर निगाह रखने के लिए भी इस्तेमाल करना चाहता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इसी प्रभाव को बढ़ाने के लिए चीनी राजदूत जाफना स्थित पब्लिक लाइब्रेरी गए थे और वहां उन्होंने स्थानीय समुदाय को खाने के पैकेट बांटे। यह लाइब्रेरी 1981 में श्रीलंका में बढ़ती विद्रोही गतिविधियों के बीच भारत की मदद से बनाई गई थी। इसके अलावा चीनी राजदूत नाल्लुर कंदास्वामी कोविल मंदिर भी गए थे, जहां उन्होंने दर्शन करने के बाद स्थानीय समुदाय के लोगों से भी मुलाकात की। गौरतलब है कि यह किसी चीनी राजदूत की तरफ से उत्तरी प्रांत का पहला दौरा था। यह क्षेत्र तमिल समुदाय के नियंत्रण वाला है और यहां रहने वाले लोगों की भारत से काफी करीबी है।