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ड्रैगन की साजिश का खुलासा!: गलवां तनाव के सात दिन बाद चीन ने किया था परमाणु परीक्षण, अमेरिका के आरोपों से हलचल

Sun, 08 Feb 2026 08:53 AM IST
शुभम कुमार वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन।

सार

साल 2020 का था, जब दुनिया कोविड-19 की मार से बेहाल थी और भारत-चीन सीमा पर तनाव अपने चरम पर पहुंच चुका था, उसी वक्त चीन ने बेहद गंभीर और चौंकाने वाली चाल चली। अमेरिका का दावा है कि गलवां झड़प के कुछ ही दिनों बाद चीन ने गुप्त तरीके से परमाणु परीक्षण किया। वैश्विक संकट की आड़ में की गई इस कथित चाल ने ड्रैगन की रणनीति और मंशा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

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चीन की चाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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2020 में जब पूरी दुनिया कोविड महामारी से जूझ रही थी और दूसरी ओर गलवाल घाटी में भारत और चीन के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच गया था। इसी दौरान तनाव की आड़ में चीन अपने नापाक मंसूबे को अंजाम देने की तैयारी में लगा हुआ था। आरोप है कि गलवां घाटी में भारतीय सैनिकों की शहादत के कुछ ही दिनों बाद चीन ने गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण किए। ये आरोप अमेरिका ने लगाए हैं। ऐसे में देखा जाए तो यह केवल अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन के लिए भी गंभीर चेतावनी है। इतना ही नहीं ऐसे संवेदनशील समय में चीन की यह कथित गतिविधि उसकी मंशा और दीर्घकालिक रणनीति पर अहम सवाल भी खड़े करती है।

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बता दें कि अमेरिका ने बीते शुक्रवार को चीन पर यह आरोप लगाए हैं। अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट थॉमस जी डिनैनो ने कहा है कि चीन ने गुप्त रूप से परमाणु विस्फोट परीक्षण किए, ताकि दुनिया को इसकी भनक न लगे। अमेरिका का दावा है कि चीन ने ऐसे तरीके अपनाए जिससे भूकंप मापने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रणालियां (सीस्मिक मॉनिटरिंग) भी इन परीक्षणों को ठीक से पकड़ न सकें।

कब किया था चीन ने ये परीक्षण?
डिनैनो के मुताबिक, 22 जून 2020 को चीन ने ऐसा ही एक परमाणु परीक्षण किया था। यह तारीख इसलिए भी अहम है क्योंकि यह परीक्षण गलवां घाटी में भारत-चीन हिंसक झड़प के ठीक एक हफ्ते बाद हुआ था। गलवां संघर्ष में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे, जबकि खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार 30 से ज्यादा चीनी सैनिक भी मारे गए थे।

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चीन ने किस तकनीक का किया था इस्तेमाल
अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि चीन ने जिस तकनीक का इस्तेमाल किया, उसे ‘डिकपलिंग’ कहा जाता है। इस तकनीक में विस्फोट को इस तरह अंजाम दिया जाता है कि उसके झटके कम महसूस हों और अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसियों को शक न हो। अमेरिका का कहना है कि चीन सैकड़ों टन क्षमता वाले परमाणु परीक्षणों की तैयारी और उन्हें अंजाम दे चुका है। इतना ही नहीं डिनैनो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सिलसिलेवार पोस्ट में बताया कि चीन का यह कदम पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है। उन्होंने कहा कि मौजूदा परमाणु समझौते आज की चुनौतियों से निपटने में नाकाम हो चुके हैं।

न्यू स्टार्ट संधि का किया जिक्र, इसके बारे में भी जानिए
इस दौरान डिनैनो ने न्यू स्टार्ट संधि का भी जिक्र किया, जो 2010 में अमेरिका और रूस के बीच हुई थी। इस संधि का मकसद परमाणु हथियारों की संख्या को सीमित करना था। लेकिन डिनैनो के मुताबिक, 2026 तक यह संधि अप्रासंगिक हो जाएगी क्योंकि चीन बहुत तेजी से अपना परमाणु जखीरा बढ़ा रहा है। रूस के पास बड़ी संख्या में ऐसे हथियार हैं जो इस संधि के दायरे में नहीं आते और चीन के एक भी परमाणु हथियार पर इस संधि का कोई नियंत्रण नहीं है। 

उन्होंने कहा कि जहां अमेरिका के ज्यादातर परमाणु हथियार न्यू स्टार्ट के तहत सीमित थे, वहीं रूस और चीन पर इसका असर बेहद कम या न के बराबर रहा। अमेरिकी अधिकारी ने साफ कहा कि अब अमेरिका को अपने नागरिकों और सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए नई परमाणु नीति और नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने की जरूरत है, जो आज के खतरों को ध्यान में रखे, न कि पुराने दौर की परिस्थितियों को।

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ट्रंप भी दे चुके हैं बड़े संकेत
गौरतलब है कि इससे पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी ऐसे संकेत दे चुके हैं। बीते साल अक्तूबर में उन्होंने कहा था कि अगर रूस और चीन परमाणु परीक्षण करते हैं, तो अमेरिका भी उसी स्तर पर परीक्षण शुरू कर सकता है, हालांकि तब उन्होंने कोई ठोस जानकारी नहीं दी थी। डिनैनो का बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका न्यू स्टार्ट संधि के खत्म होने के बाद रूस और चीन के साथ तीन देशों की नई बातचीत शुरू करना चाहता है, ताकि परमाणु हथियारों पर नए सिरे से सीमाएं तय की जा सकें। हालांकि चीन ने फिलहाल ऐसी किसी भी बातचीत में शामिल होने से इनकार कर दिया है।

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