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तेजी से एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं रूस और चीन, भारत को 21वीं सदी के हिसाब से बनाने होंगे संबंध

Thu, 19 Sep 2019 05:58 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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chinese Pm Li Keqiang and russian PM Dmitry Medvedev - फोटो : South China Morning Post
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रूस और चीन के बीच व्यापारिक साझेदारी लगातार बढ़ रही है। पिछले नौ सालों से चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना है। वहीं दोनों देशों ने अब द्वपक्षीय व्यापार एव सहयोग को दोगुना करने का फैसला किया है। आंकड़ों के मुताबिक जहां भारत और रूस के बीच द्वपक्षीय व्यापारिक संबंध फिलहाल 90 लाख अमेरिकी डॉलर का है जिसे 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने की कोशिशें हो रही हैं, वहीं चीन और रूस के बीच यह दोगुने से भी ऊपर पहुंच चुका है।

बेल्ट एंड रोड इनिशियेटिव पर जोर

हाल ही में चीन के प्रधानमंत्री ली खछ्यांग ने 16 से 18 सितंबर तक रूस की यात्रा की और रूसी प्रधानमंत्री मेदवेदेव के साथ 24वीं चीन-रूस प्रधानमंत्री वार्ता में हिस्सा लिया। इस बैठक में ली ने यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन के साथ बेल्ट एंड रोड इनिशियेटिव की मजबूती पर जोर दिया। साथ ही, रूस के साथ नाभिकीय ऊर्जा, निवेश, कृषि, अंतरिक्ष एवं अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। वहीं दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों में भी मजबूत साझेदारी उभर रही है।

दो खरब डॉलर तक व्यापार पहुंचाने की तैयारी

इन दिनों चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, पिछले साल दोनों देशों के बीच व्यापार में 27 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, और यह साझेदारी बढ़ कर पहली बार 10 हजार करोड़ डॉलर तक पहुंच गई है। वहीं दोनों देशों की कोशिश है कि साल 2024 तक इसे बढ़ा कर दो खरब अमेरिकी डॉलर कर पहुंचाया जाए। इस साल के जनवरी से अक्टूबर तक चीन और रूस के बीच व्यापार 70 अरब 59 करोड़ डॉलर रहा, जो वर्ष 2018 की इसी अवधि से 4.5 प्रतिशत अधिक रहा। वहीं वर्ष 2018 में चीन और रूस के सेवा व्यापार का तेज विकास हुआ, जो 17 अरब 59 करोड़ डॉलर था, जिसकी वृद्धि दर करीब एक गुना है।

पिछले साल चीन के साथ किया था बड़ा युद्धाभ्यास

वहीं पिछले कुछ सालों से रक्षा मामलों में भी दोनों देशों की बीच संबंध प्रगाढ़ हो रहे हैं। दोनों देशों की सेनाओं के बीच हर साल युद्धाभ्यास हो रहा है। पिछले साल सितंबर में रूस ने चीन के साथ दुनिया का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास वोस्तोक-2018 किया था, जिसमें तकरीबन तीन लाख से ज्यादा सैनिकों, 36 हजार सैन्य वाहनों, एक हजार हवाईजहाज और 80 जंगी जलपोतों ने हिस्सा लिया था। जबकि चीन ने इस अभ्यास में 3,500 सैनिक और 900 हथियार भेजे थे। 

इस साल भी हुई मिलिट्री ड्रिल

वहीं इस साल भी रूस ने सितंबर में सेंटर 2019 के नाम से मिलिट्री ड्रिल आयोजित की है, जिसमें चीन के साथ दूसरे छह देशों जिसमें कजाखस्तान, किरगिजस्तान, तजाकिस्तान, उजबेकिस्तान के साथ भारत और पाकिस्तान को भी शामिल किया गया है। इस अभ्यास में 1.28 लाख सैनिकों, 20 हजार हथियारों और सैनिक साजोसामान, 600 लड़ाकू विमानों और 15 युद्धपोतों ने हिस्सा लिया। वहीं चीन ने इस अभ्यास में 1600 सैनिकों के साथ टाइप 96ए युद्ध टैंक, एच-6के बॉम्बर्स, जेएच-7ए फाइटर्स बॉम्बर्स, जे-11 फाइटर्स जेट्स, आईआई-76 और वाई-9 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, जेड-10 अटैक हेलीकॉप्टर्स को हिस्सा लेने के लिए भेजा है।

भारत के लिए दुविधा

वहीं हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दो दिवसीय रूस दौरा किया था, जिसमें दर्जनों समझौतों पर दस्तखत किए गए थे। दरअसल भारत के लिए दुविधा है कि उसे अमेरिका और रूस दोनों से बना कर रखना है। रूस से भारत के बेहद पुराने रिश्ते हैं और न्यूक्लियर एनर्जी प्लांट, अंतरिक्ष और शीत युद्ध के दौरान 1960 से ही 90 फीसदी हथियार रूस से ही आयात होते थे। भारतीय वायुसेना में जहाजों के 31 स्कवॉड्रनों में एक बड़ी खेप रूसी लड़ाकू जहाजों की है और अमेरिका के मुकाबले वह हथियार देने के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफऱ भी करता है।

21वीं सदी के हिसाब से बनाने होंगे संबंध

वहीं अमेरिका को कई बार भारत की रूस के साथ दोस्ती रास नहीं आती है। एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम के समझौते के दौरान अमेरिका सवाल उठा चुका है और उस दौरान भारत पर कुछ प्रतिबंध लगाने की बात भी कही थी। अमेरिका की तरफ से लगातार सवाल उठने के बाद  भारत ने अपनी रणनीति में बदलाव लाते हुए रूस के अलावा इजरायल, फ्रांस और यूरोप से भी हथियार खरीदने शुरू कर दिए। वहीं भारत और रूस को अब संबंध 21वीं सदी के हिसाब से बनाने होंगे, क्योंकि अब समीकरण बदल चुके हैं और अपने-अपने हितों को देखते हुए साझेदारियों को आगे बढ़ाना होगा।     

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