अफ्रीकी देशों का समर्थन जुटाने की कोशिश में चीन ने एक नई चाल चली है। उसने इन देशों को जी-20 और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक नुमाइंदगी दिलाने का वादा किया है। जबकि विशेषज्ञों की राय है कि ऐसा सचमुच हो पाने की स्थितियां बिल्कुल ही मौजूद नहीं हैं।
अफ्रीका के दस देशों के समूह कमेटी ऑफ टेन (सी-10) की हाल में हुई बैठक से ठीक पहले चीन के कांगो स्थित चीनी राजदूत ने कांगो के अंतरराष्ट्रीय सहयोग मंत्री डेनिस क्रिस्टेल सेसाउ एन्गुएसो के सामने यह प्रस्ताव रखा। बाद में एऩ्गुएसो ने अब पत्रकारों को बताया है- ‘हमने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के बारे में बातचीत की, ताकि अफ्रीका को अधिक प्रतिनिधित्व मिल सके। इसमें सुरक्षा परिषद में वीटो अधिकार के साथ स्थायी सदस्य के रूप में अफ्रीका को दो सीट मिलने की बात भी शामिल है।’
सी-10 के सदस्यों में अल्जीरिया, इक्वेटोरियल गिनी, केन्या, लीबिया, नामीबिया, सेनेगल, सियरा लिओन, कांगो गणराज्य, यूगांडा और जाम्बिया शामिल हैं। अल्जीरिया के विदेश मंत्री रेमताने लामामरा ने बताया कि कांगो की राजधानी ब्रेजविले में हुई बैठक के दौरान सुरक्षा परिषद के ढांचे में सुधार और अफ्रीकी प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर खास चर्चा हुई।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि दुनिया में तेज होती गोलबंदी के बीच चीन ने अफ्रीका में अपने पांव जमाने की कोशिश तेज कर दी है। अभी जबकि ब्रेजविले में सी-10 की बैठक चल रही थी, उसी दौरान चीन के विदेश मंत्री चिन गांग ने पांच अन्य अफ्रीकी देशों की यात्रा शुरू कर दी। उन्होंने भी उस यात्रा के दौरान अफ्रीकी देशों को जी-20 और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व दिलाने का वादा किया।
अफ्रीकी नेताओं की प्रतिक्रिया से संकेत मिला है कि वहां चीन का दांव फिलहाल कामयाब हो रहा है। वे इस बात से खुश हैं कि अधिक प्रतिनिधित्व की उनकी मांग का चीन ने समर्थन किया है। ऐसा करने वाला वह पहला बड़ा गैर-अफ्रीकी देश बना है।
अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक अफ्रीकी देशों के संगठन अफ्रीकन यूनियन (एयू) से जुड़ी संस्था एयू कमीशन के अध्यक्ष मूसा मेहमत ने कहा है- ‘यह बात स्वीकार्य नहीं है कि हमारे मुद्दों पर फैसला दूसरे देश करें। यह उचित नहीं है। हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऩई व्यवस्था चाहते हैं, जिसमें दूसरों के हितों का भी सम्मान किया जाए।’
लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक अफ्रीकी देशों को प्रतिनिधित्व मिलना आसान नहीं है। अभी भारत, जर्मनी, ब्राजील और जापान जैसे बड़े देशों की सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता पाने की मुहिम अभी तक आगे नहीं बढ़ पाई है। ऐसे में यह सवाल वाजिब है कि क्या अफ्रीकी देशों से चीन ने झूठा वादा किया है।
जी-20 में भी अफ्रीकी प्रतिनिधित्व के बढ़ने की गुंजाइश कम है। वाशिंगटन स्थित नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी में अफ्रीका सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज से जुड़े विशेषज्ञ पॉल नैंतुलया ने ध्यान दिलाया कि जी-20 में सिर्फ एक अफ्रीकी देश (दक्षिण अफ्रीका) शामिल है। इसके बावजूद इस समूह के विस्तार की संभावना कम ही है।
विश्लेषकों के मुताबिक अफ्रीकी प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग का समर्थन करना चीन की एक कूटनीतिक पहल से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन इससे चीन को अफ्रीका में सद्भावना जरूर हासिल होगी, जो मौजूदा अंतरराष्ट्रीय माहौल के बीच उसके लिए महत्त्वपूर्ण है।