रविवार को चिली में नए संविधान के मसविदे पर जनमत संग्रह होगा। इस सविधान को लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के इतिहास में एक खास दस्तावेज बताया जा रहा है। इसका मकसद चिली में मौजूद आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी को खत्म करना बताया गया है। लेकिन चिली के जनमत का एक हिस्सा इससे संतुष्ट नहीं है। उसकी शिकायत है कि इस संविधान में मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के लिए काफी गुंजाइश छोड़ दी गई है, जिसके रहते बराबरी का लक्ष्य हासिल नहीं हो सकेगा।
नया संविधान बनाने का रास्ता 2020 में देश भर में हुए व्यापक जन प्रदर्शनों से निकला था। तब आंदोलनकारियों की मांग के आगे झुकते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति सिबैस्टियन पिनेरा ने इस सवाल पर जनमत संग्रह कराया कि क्या देश में नया संविधान बनाया जाना चाहिए। इसमें 78 फीसदी मतदाताओं ने नया संविधान बनाने का समर्थन किया। उसके बाद संविधान सभा का चुनाव हुआ। संविधान सभा ने पिछले जुलाई में नए संविधान का प्रारूप जारी किया।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस बात की काफी संभावना है कि चार सितंबर को होने वाले जनमत संग्रह में नए संविधान के प्रारूप को ठुकरा दिया जाएगा। वामपंथी राष्ट्रपति गैब्रियेल बोरिच की सरकार ने भी ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया है।
संविधान सभा ने नया प्रारूप तैयार करने की जो प्रक्रिया अपनाई, उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तारीफ हुई है। प्रारूप में लैंगिक समानता लाने के उपाय शामिल किए गए हैं। साथ ही मूलवासी समुदायों को उचित प्रतिनिधित्व देने के प्रावधान इसमें शामिल हैं। जल के निजीकरण को खत्म करने और पर्यावरण संरक्षण की व्यवस्था भी इसमें शामिल की गई है। नए संविधान के तहत देश में स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था को सार्वजनिक क्षेत्र में लाया जाएगा। इसके अलावा सीनेट को खत्म कर उसकी जगह चिली के विभिन्न क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने वाले सदन की स्थापना होगी।
विश्लेषकों के मुताबिक अगर जनमत संग्रह में प्रारूप को पास कर दिया गया, तो यह संभवतया दुनिया का सबसे प्रगतिशील संविधान होगा। इसके बावजूद समाज के कई तबके इस प्रारूप से खुश नहीं हैं। दक्षिणपंथी समूहों के एक बड़े धड़े ने प्रारूप को अति प्रगतिशील और आर्थिक विकास के खिलाफ बताया है। जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक दक्षिणपंथी तबकों की पूरी गोलबंदी नए प्रारूप के खिलाफ है। ऐसे में अगर प्रगतिशील तबकों के कुछ समूहों ने भी इसके खिलाफ मतदान कर दिया, तो प्रारूप का पारित होना कठिन हो जाएगा।
वामपंथी संगठनों के समूह ‘अमारियोस पॉर चिले’ ने मतदाताओं से प्रारूप को ठुकरा देने का आह्वान किया है। उसके संयोजक क्रिश्चियन वार्केन ने एक जनसभा में कहा- ‘हम ऐसा नया संविधान चाहते थे, जो सामाजिक अधिकारों की गारंटी करे, पर्यावरण को बचाए और उन मांगों को पूरा करे, जो हमने पेश की थीं। लेकिन संविधान सभा ने इसे ऐसा वैचारिक वक्तव्य बना दिया है, जिससे हमारे सामने आई एक बड़ी संभावना कुंद हो जाएगी।’
सांतियागो स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पब्लिक स्टडीज में रिसर्चर सिबैस्टियन इज्क्वेर्दो ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘प्रारूप में बड़ी बातें कही गई हैं, लेकिन इसमें शामिल प्रस्तावों के कारण सहमति तक पहुंचना कठिन हो जाएगा। इसकी भाषा अस्पष्ट रखी गई है, जो कई समस्याओं की जड़ बनेगी।’