इसमें 1946 में जन्म के समय व्यक्तियों की भर्ती का विवरण देखा गया और फिर साल 2019 तक स्वास्थ्य और मृत्यु के रिकॉर्ड को देखा। 3,589 लोगों की रिपोर्ट निकाली गई। इसमें 25 प्रतिशत के पास दो साल की उम्र से पहले एलआरटीआई था।
द लैंसेट जर्नल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगर किसी शख्स को बचपन में दो साल की उम्र तक ब्रोंकाइटिस या फिर निमोनिया जैसी बीमारी होती है तो बड़े होने पर सांस की बीमारी से उसपर मौत का जोखिम बढ़ जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे लोगों को अगर 26 से 73 साल की उम्र में कोई सांस की बीमारी होती है तो उनकी मौत की संभावना अन्य मरीजों के मुकाबले 93 प्रतिशत अधिक होती है। ऐसे लोग समय से पहले दम तोड़ सकते हैं। शोधकर्ताओं ने दावा किया कि सांस की पुरानी बीमारियां सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी समस्या है। 2017 में अनुमानित 3.9 मिलियन लोगों की इसके चलते मौत हुई थी। जो दुनिया भर में होने वाली सभी मौतों का सात प्रतिशत है।
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रिपोर्ट में और क्या दावे हुए?
रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर मौतों का कारण क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) है। बचपन में अगर किसी को फेफड़े की दिक्कत होती है तो बड़े होने पर भी उसका फेफड़ा कमजोर ही हो जाता है। इंपीरियल कॉलेज लंदन के अध्ययन प्रमुख जेम्स एलिंसन ने कहा, 'वयस्क श्वसन रोग के लिए वर्तमान निवारक उपाय मुख्य रूप से धूम्रपान जैसे वयस्क जीवन शैली जोखिम कारकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।'
एलिंसन ने कहा, 'पांच में से एक वयस्क की सांस से होने वाली मौत को कई दशकों पहले बचपन में आम संक्रमण से जोड़ना वयस्कता से पहले जोखिम को अच्छी तरह से लक्षित करने की आवश्यकता को दर्शाता है।'
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ऐसे किया गया अध्ययन
सांस की बीमारियों पर अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञों ने ब्रिटिश कॉहोर्ट (स्वास्थ्य और विकास का राष्ट्रीय सर्वेक्षण) के डेटा का उपयोग किया। इसमें 1946 में जन्म के समय व्यक्तियों की भर्ती का विवरण देखा गया और फिर साल 2019 तक स्वास्थ्य और मृत्यु के रिकॉर्ड को देखा। 3,589 लोगों की रिपोर्ट निकाली गई। इसमें 25 प्रतिशत के पास दो साल की उम्र से पहले एलआरटीआई था। 2019 के अंत तक इनमें से 19 प्रतिशत लोगों की मौत 73 साल की उम्र से पहले तक हो गई थी। इन 674 समयपूर्व वयस्क मौतों में से आठ प्रतिशत प्रतिभागियों की मृत्यु सांस की बीमारी और ज्यादातर की सीओपीडी से हुई।