डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति पद से हटने के बाद अमेरिका में सोशल मीडिया की चर्चाओं में भारी बदलाव आया है। फरवरी के पहले दो हफ्तों के ट्रेंड के अध्ययन से सामने आया कि अब ट्रंप के दौर की तरह व्यक्ति केंद्रित चर्चाएं बहुत घट गई हैं। इसके बजाय लोग घटनाओं और वैचारिक मुद्दों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। ये अध्ययन सोशल मीडिया और इस माध्यम को प्रभावित करने वाली शख्सियतों की निगरानी करने वाली एजेंसी कीहोल ने किया है।
कीहोल का कहना है कि अब राजनेता, सेलिब्रिटी और कारोबारी शख्सियतें नई परिस्थिति के मुताबिक खुद को ढाल रहे हैं। जानकारों का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप सोशल मीडिया का इस्तेमाल समाज में उत्तेजना फैलाने के लिए करते थे। ऐसा वे दिन-रात करते थे। इससे ध्यान उन पर ही केंद्रित रहता था, जबकि अहम खबरें महत्वहीन बनी रहती थीं। ट्रंप चर्चा को अपने ढंग से संचालित करने में कामयाब बने रहे। लेकिन अब एक बार फिर चर्चा व्यक्ति से हट कर सामूहिक मसलों पर केंद्रित हो रही है।
कीहोल के मुताबिक फरवरी के पहले दो हफ्तों में राष्ट्रपति जो बाइडन के बारे में अनुमानतया एक करोड़ 38 लाख पोस्ट सोशल मीडिया पर डाले गए। जबकि जनवरी के पहले दो हफ्तों में ट्रंप के बारे में दस करोड़ 40 लाख पोस्ट डाले गए थे। इस तरह फरवरी के पहले दो हफ्तों में पदासीन राष्ट्रपति के बारे में डाले गए पोस्ट उसके पिछले महीने की इसी अवधि की तुलना घटकर आठवें हिस्से के बराबर रह गए।
कीहोल के मुताबिक ट्रंप के बाद के दौर में सोशल मीडिया पर दो तरह के ट्रेंड दिख रहे हैं। कुछ नेता अभी भी ट्रंप शैली के पोस्ट डाल रहे हैं। इन नेताओं में रिपब्लिकन पार्टी के सीनेटर जोश हॉवले और हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव की रिपब्लिकन सदस्य मारजोरी टेलर ग्रीन शामिल हैं। वे अभी भी चुनाव में हुई धांधली और ‘सोशलिस्ट’ डेमोक्रेटिक पार्टी की कथित साजिशों की चर्चा कर रहे हैं। कुछ गैर-राजनेता भी भड़काऊ पोस्ट का सहारा ले रहे हैं।
लेकिन ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है, जो सरल और सीधी भाषा में सार्वजनिक महत्व के मुद्दों की चर्चा कर रहे हैं। ऐसा करने वालों में बाइडन प्रशासन से जुड़े लोग भी हैं, जिनका सोशल मीडिया रुख पूर्व प्रशासन से बिल्कुल अलग है। राष्ट्रपति बाइडन अपनी घोषणाए नियोजित और व्यवस्थित ढंग से करते हैं। वे ट्रंप की तरह ट्विटर पर एलान नहीं करते। बल्कि सुविचारित ढंग से प्रेस ब्रीफिंग में उनके फैसलों की जानकारी दी जाती है। इससे उन लोगों को राहत मिली है, जो सार्वजनिक जीवन में तर्क और विवेक को महत्व देते हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने भी चर्चा की शैली बदलने और इन चर्चाओं के कारण पैदा होने वाली गरमी को घटाने में भूमिका निभाई है। फेसबुक ने यूजर्स के न्यूड फीड में राजनीतिक टॉपिक्स को कम दिखाने का एल्गोरिद्म सक्रिय कर दिया है। इससे फिलहाल सियासी तापमान घटाने में मदद मिली है। वैसे विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस नीति पर कब तक चलेंगे, यह कहा नहीं जा सकता। मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप के दौर में ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाले मीडिया घरानों और व्यक्तियों को खूब फायदा हुआ। उससे उनकी आमदनी बढ़ी। विश्लेषकों के मुताबिक जिन लोगों का उस माहौल में निहित स्वार्थ बन गया, वे आसानी से अपने संचार का तरीका नहीं बदलेंगे।
संचार के विशेषज्ञ इसे ध्यान ‘खींचने की अर्थव्यवस्था’ (अटेंशन इकोनॉमी) कहते हैं। ये अवधारणा 1970 के दशक में ही विकसित हो गई थी। लेकिन इंटरनेट के प्रसार के साथ इसका भी तेजी से प्रसार हुआ। जानकारों का कहना है कि फिलहाल मीडिया और सोशल मीडिया चर्चाओं में उत्तेजना घटी है। यह समाज के लिए फायदेमंद है।