दुनिया भर के सेंट्रल बैंक अपनी रिजर्व करेंसी में चीन की मुद्रा युवान का हिस्सा बढ़ा रहे हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय कारोबार में अमेरिकी मुद्रा डॉलर के वर्चस्व के लिए खतरा पैदा हो रहा है। चीनी मुद्रा की बढ़ रही हैसियत को चीन की आर्थिक ताकत में बढ़ोतरी का संकेत भी समझा जा रहा है। ये बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपत्ति प्रबंधन करने वाली कंपनी- यूबीएस एसेट मैनेजमेंट ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कही है।
विश्लेषकों के मुताबिक बीती फरवरी में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने जिस तरह रूस की विदेशी मुद्रा को जब्त कर लिया, उससे सेंट्रल बैंकों का डॉलर के प्रति भरोसा घटा है। इसलिए अब वे अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अलग-अलग मुद्राओं को जगह देना चाह रहे हैं। वे ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जिससे अगर कभी अमेरिका प्रतिबंध लगाए, तो वे उससे ज्यादा प्रभावित न हों।
यूबीएस ने अपने इस सर्वे में प्रमुख अर्थव्यवस्था वाले 30 देशों के सेंट्रल बैंक अधिकारियों से बातचीत की। ये बातचीत अप्रैल से जून के बीच की गई। इन देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में जून तक डॉलर का हिस्सा 63 फीसदी था। 2021 के जून में ये हिस्सा 69 फीसदी था। यूबीएस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है- ‘यूक्रेन पर रूसी हमले, रूस के साथ चीन के करीबी संबंधों, और हाल के वर्षों में चीन में दर्ज हुई मजबूत आर्थिक वृद्धि के कारण बहु-ध्रुवीय विश्व बनने की चर्चा शुरू हो गई है। इसका अर्थ यह है कि अब दुनिया पर अमेरिका पूरा वर्चस्व नहीं रहा।’
यूबीएस के सर्वे में शामिल 81 फीसदी अधिकारियों ने कहा कि बहु-ध्रुवीय दुनिया बनने का लाभ चीन की मुद्रा युवान को मिलेगा। 46 फीसदी अधिकारियों ने कहा कि उसका फायदा डॉलर को भी मिलेगा। यूबीएस के विश्लेषकों ने कहा है- ‘युवान का स्थिर गति से रिजर्व करेंसी के रूप में उदय हो रहा है। उसमें दिलचस्पी बढ़ी है, फिर भी नंबर एक रिजर्व करेंसी के रूप में डॉलर की हैसियत को चुनौती देने के लक्ष्य से अभी वह बहुत दूर है।’