गर्भ में पल रहा बच्चा भी संक्रमण की चपेट में आ सकता है। पेरिस में पेरिस साक्ले यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के बाल रोग विभाग के शोधकर्ता डॉ. डेनियल डी लुका का कहना है कि गर्भ में पल रहे बच्चे को भी कोरोना हो सकता है। एक महिला को 35 सप्ताह का गर्भ था। कई दिनों से बुखार और खांसी की तकलीफ के साथ अस्पताल आई थी। जन्म के साथ बच्चे में वायरस मिला जो अब तीन महीने का हो चुका है और पूरी तरह ठीक है।
डॉ. लुकी के अनुसार तीन दिन बाद गर्भवती की हालत बिगड़ी तो ऑपरेशन से बच्चे का जन्म हुआ। बच्चे को एनआईसीयू में वेंटिलेटर पर छह घंटे तक रखा गया और वो पूरी तरह सामान्य हो गया। तीसरे दिन उसे बदन दर्द, चिड़चिड़ापन और दूध पीने में तकलीफ हुई तो सीटी स्कैन जांच कराई गई जिसमें पता चला कि उसके मस्तिष्क में में सूजन है और मस्तिष्क के सफेद भाग को नुकसान हुआ है। सभी तरह की जांच हुई जिसकी रिपोर्ट निगेटिव थी, बाद में कोरोना की जांच की गई तो उसमें वायरस की पुष्टि हुई।
बच्चे को 18 दिन तक अस्पताल में रखा और उसके बाद छुट्टी दे दी। शिशु अब तीन महीने का हो गया है और मां के साथ वो पूरी तरह स्वस्थ है। टेक्सास में भी एक नवजात में कोरोना की पुष्टि हुई है जो सांस संबंधी तकलीफ के साथ पैदा हुआ था। इसी आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान बच्चे को भी गर्भ में संक्रमण होने की पूरी संभावना है।
संक्रमण कैसे संभव, इसकी पूरी पड़ताल
जर्नल नेचर कम्युनिकेशन की रिपोर्ट में डॉ. डे लुका का कहना है कि गर्भनाल, एमनॉटिक फ्लूड, कॉर्ड ब्लड के साथ मां और बच्चे के रक्त की जांच में पता चला कि वायरस गर्भनाल में पहुंचकर संख्या बढ़ाता है। फिर गर्भाशय में हुआ संक्रमण बच्चे को जकड़ता है। इस तरह से संक्रमण में बच्चे में बड़े लोगों जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं।
गर्भनाल से बच्चे के शरीर में वायरस
यूनिवर्सिटी और पीटर्सबर्ग के डॉ. योल साडोवस्की का कहना है कि गर्भनाल से संक्रमण संभव है। गर्भनाल में बड़े पैमाने पर वायरस की मौजूदगी से बच्चे में वायरस संख्या बढ़ा सकता है। बच्चे में कोरोना के लक्षण के साथ गर्भनाल में सूजन भी संभव है। हां जिका और रुबेला वायरस की तुलना में ये बहुत दुर्लभ है। अब हम ये जानने की कोशिश में लगे हैं कि गर्भनाल और गर्भाश्य को इससे कैसे बचाया जा सकता है।
गर्भनाल में आसानी से बढ़ता है वायरस
शोधकर्ताओं ने पाया कि गर्भनाल में वायरस की मौजूदगी ज्यादा थी, एमनॉटिक फ्ल्यूइड और मां और बच्चे के खून में संख्या कम पाई गई थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि वायरस गर्भनाल में आसानी से संख्या बढ़ाता है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि तस्वीर साफ होने के बाद गर्भवती महिलाओं और नवजातों को गंभीर रूप से संक्रमण की चपेट में आने से बचाया जा सकता है।