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कैग की रिपोर्ट में खुलासा: गंगा का कीचड़ खेतों तक पहुंचा, सेहत पर बड़ा खतरा; एसटीपी में स्लज का निस्तारण नहीं

Sat, 01 Aug 2026 08:27 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।

सार

गंगा सफाई से निकले स्लज का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में पूरी तरह निस्तारण नहीं होने के कारण गंगा का कीचड़ खेतों तक पहुंचने लगा है। इससे इंसानों की सेहत पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
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गंगा (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए बनाए गए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) अब एक नए पर्यावरणीय संकट का कारण बनते दिखाई दे रहे हैं। शहरों के सीवेज को शोधित कर गंगा में छोड़ने की प्रक्रिया के दौरान बड़ी मात्रा में निकलने वाला स्लज (कीचड़) उचित प्रबंधन के अभाव में खेतों तक पहुंच रहा है।

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नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ताजा रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि कई स्थानों पर इस स्लज में जिंक, कैडमियम और अन्य भारी धातुएं निर्धारित सीमा से अधिक पाई गईं, इसके बावजूद इसका उपयोग कृषि भूमि में किया गया। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि इस पर तत्काल नियंत्रण नहीं किया गया तो इसका असर केवल मिट्टी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भूजल, फसलों और पूरी खाद्य श्रृंखला तक पहुंच सकता है। गंगा संरक्षण परियोजनाओं का मूल्यांकन करते हुए सीएजी ने उत्तर प्रदेश के कई एसटीपी में स्लज प्रबंधन की गंभीर खामियां उजागर की हैं।

पांच सबसे बड़े सवाल

  • एसटीपी पहले बने, सीवर नेटवर्क बाद में क्यों तैयार हुआ?
  • सीवेज की मात्रा और एसटीपी क्षमता का आकलन गलत कैसे हुआ?
  • बिना उपचारित सीवेज गंगा में छोड़ने वालों पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  • भारी धातुओं वाला स्लज किसानों तक कैसे पहुंच गया?
  • उत्तर प्रदेश के बाद अन्य गंगा राज्यों का व्यापक ऑडिट कब होगा?

चार दशक की गंगा सफाई : एक नजर

  • 1985 : गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत
  • 1993 : गंगा एक्शन प्लान (फेज-2) लागू
  • 2009 : राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन
  • 2014 : नमामि गंगे मिशन का शुभारंभ
  • 2026 : सीएजी रिपोर्ट में एसटीपी, स्लज प्रबंधन और निगरानी की गंभीर खामियां उजागर

भविष्य में पहुंच सकता है नुकसान

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एसटीपी से निकलने वाले स्लज को कई जगह जैविक खाद के विकल्प के रूप में किसानों को उपलब्ध कराया गया। लेकिन परीक्षण में कुछ नमूनों में जिंक और कैडमियम जैसी भारी धातुओं का स्तर निर्धारित मानकों से अधिक पाया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी धातुएं मिट्टी में वर्षों तक बनी रहती हैं। धीरे-धीरे ये फसलों की जड़ों के माध्यम से खाद्यान्न में पहुंच सकती हैं और अंततः मानव शरीर में प्रवेश कर दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती हैं।

  • रिपोर्ट में प्रयागराज के कोडरा एसटीपी का विशेष उल्लेख किया गया है। यहां स्लज के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए अलग स्लज मैनेजमेंट प्लांट बनाया गया, लेकिन उसका संचालन शुरू ही नहीं हो सका।
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