रिकॉर्ड महंगाई और रेल हड़ताल से जूझ रहे ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को अब सियासी मोर्चे पर तगड़ा झटका लगा है। कुछ ही समय पहले जॉनसन जद्दोजहद के बाद अपनी कंजरवेटिव पार्टी के भीतर दोबारा विश्वास मत जीतने में सफल रहे थे। अब दो उपचुनावों में पार्टी की हार से उनके नेतृत्व पर फिर से सवाल उठने लगे हैं। उपचुनावों में हार के बाद कंजरवेटिव पार्टी के अध्यक्ष ओलिवर डॉवडेन ने इस्तीफा दे दिया है। इससे जॉनसन पर दबाव और बढ़ गया है।
प्रधानमंत्री जॉनसन इस समय रवांडा की यात्रा पर गए हैं। वहां से वे जी-7 की शिखर बैठक में हिस्सा लेने जर्मनी जाएंगे। फिर नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) की बैठक में हिस्सा लेने के लिए वे स्पेन जाएंगे। इस तरह वे अगला पूरा हफ्ता देश से बाहर रहेंगे। लेकिन इस बीच अब कंजरवेटिव पार्टी में उनका विरोधी खेमा फिर से अपनी आवाज उठाने लगा है।
रवांडा की राजधानी किगाली में पत्रकारों से बात करते हुए जॉनसन ने कहा कि इन चुनाव नतीजों के पीछे कई कारण हैं। उनमें महंगाई भी शामिल है। उन्होंने कहा- ‘हमें स्वीकार करना होगा कि हमें और भी ज्यादा काम करने की जरूरत है और निश्चित रूप से हम ऐसा करेंगे। जब तक हम कामयाब नहीं हो जाते, तब तक हम लोगों की चिंताएं दूर करने की कोशिश में जुटे रहेंगे।’
सत्ताधारी पार्टी के वरिष्ठ सांसद सर ज्योफरी क्लिफ्टन-ब्राउन ने कहा है- ‘हमें अब नया प्रधानमंत्री चुनने की दिशा में कदम उठाने पड़ सकते हैं।’ क्लिफ्टन-ब्राउन ने कहा है कि वे इस बारे में प्रधानमंत्री जॉनसन की राय जानना चाहते हैं। उन्होंने कहा- इसमें कोई शक नहीं है कि हमें अब कुछ सख्त फैसले लेने होंगे।
विश्लेषकों का कहना है कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान प्रधानमंत्री आवास में हुई भव्य पार्टियों के मुद्दे पर उठे विवाद से जॉनसन मुश्किल से निकल पाए। उसी मामले में उन्हें पार्टी के अंदर विश्वास मत का सामना करना पड़ा। अखबार द गार्जियन के एक विश्लेषण के मुताबिक कंजरवेटिव पार्टी के संविधान के मुताबिक विश्वास मत में विजयी रहने के बाद प्रधानमंत्री को एक साल तक फिर से विश्वास मत पाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। लेकिन अखबार ने यह भी कहा है कि जरूरत पड़ने पर नियम बदले जा सकते हैं।