हैदराबाद के निजाम के फंड मामले में पाकिस्तान को एक और झटका लगा है। ब्रिटेन के हाईकोर्ट के जस्टिस मार्कस स्मिथ ने पाकिस्तान को निजाम मामले की कानूनी कार्यवाही में आई लाखों रुपये की लागत का भुगतान करने का आदेश दिया। जस्टिस स्मिथ ने ही इस साल अक्तूबर में 71 साल पुराने केस में निजाम के 306 करोड़ की रकम पर पाकिस्तान का दावा खारिज कर भारत और निजाम के दो वंशजों के पक्ष में फैसला सुनाया था।
निजाम के वंशज प्रिंस मुकर्रम जाह और उनके छोटे मुफ्फखम जाह ने भारत सरकार के साथ मिलकर पाकिस्तान सरकार के साथ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। 1948 में देश के विभाजन के दौरान हैदराबाद के सातवें निजाम मीर उस्मान अली खान ने लंदन स्थित नेटवेस्ट बैंक में करीब एक मिलियन पाउंड (करीब 8.87 करोड़ रुपये) जमा कराए थे जो अब करीब 35 मिलियन पाउंड (करीब 306 करोड़ रुपये) हैं।
जस्टिस स्मिथ ने बृहस्पतिवार को आदेश दिया कि यदि कानूनी कार्यवाही में आए खर्च की अंतिम रकम को लेकर दोनों पक्ष किसी करार पर नहीं पहुंच पाते तो पाकिस्तान को कानूनी लड़ाई में आए खर्च का 65 फीसदी चुकाना होगा। निजाम के फंड को लेकर कानूनी कार्यवाही 2013 से शुरू थी लेकिन विवाद 1948 से चला आ रहा था।
निजाम के वंशजों की ओर से कानूनी जंग लड़ने वाली लॉ फर्म विर्द्स एलएलपी के साझेदार पॉल हेविट्ट ने कहा, हमें खुशी है कि पाकिस्तान ने जस्टिस स्मिथ के फैसले का विरोध नहीं करने का फैसला लिया है। अब हमारे मुवक्किल प्रिंस मुकर्रम और मुफ्फखम यह रकम पा सकेंगे। हाईकोर्ट के 65 फीसदी कानूनी खर्च भुगतान के आदेश के तहत, भारत को 26 करोड़, प्रिंस मुकर्रम को 7.38 करोड़, उनके भाई मुफ्फखम को 17 करोड़ रुपये मिलेंगे।