आलोचनाओं को दरकिनार कर ब्रिटिश सरकार पुलिस को अधिक ताकत देने के अपने इरादे पर आगे बढ़ रही है। आलोचकों का कहना है कि अगर प्रस्तावित कानून बन गया, तो उससे नागरिकों के विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार में भारी कटौती हो जाएगी। जबकि बोरिस जॉनसन सरकार का कहना है कि आज के मुश्किल वक्त को देखते हुए ये कानून एक जरूरत बन गया है।
जॉनसन सरकार इस कानून के लिए विधेयक उस समय ले आई है, जब देश में कुछ रोज पहले एक जन प्रदर्शन के समय पुलिस की दिखी कथित दमनकारी भूमिका को लेकर विवाद चल रहा है। आरोप है कि एक महिला-सराह एवरार्ड की संदिग्ध स्थितियों में मौत के बाद हुए जन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने दमनकारी रुख अख्तियार किया। उस दौरान प्रदर्शनकारी महिलाओं को जमीन पर घसीटे जाने के वीडियो वायरल हुए, जिससे देश में भारी गुस्सा पैदा हुआ है। आरोप है कि एवरार्ड की हत्या एक पुलिसकर्मी ने की थी।
आलोचकों का कहना है कि सरकार ने संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में जो बिल पेश किया है, उसमें कई ऐसे मसलों को मिला दिया गया है, जिनके लिए अलग-अलग विधेयक लाए जाने चाहिए थे। जबकि पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ‘पुलिस, अपराध, सजा और अदालत विधेयक 2021’ के जरिए जो प्रावधान किए जा रहे हैं, उनकी जरूरत है। उनसे ‘हिंसक और अराजक’ विरोध प्रदर्शनों से निपटने में मदद मिलेगी।
बिल में ‘एक व्यक्ति के प्रतिरोध’ के बारे में भी नया नियम लागू करने का प्रस्ताव है। इसमें प्रावधान है कि अगर प्रतिरोध से इतना शोर पैदा होता है, जिससे आसपास काम कर रहे किसी संगठन के कामकाज में व्यवधान पैदा होता है, तो पुलिस उस प्रतिरोध को खत्म करा सकेगी। आलोचकों का कहना है कि इस प्रावधान के कारण किसी निजी कंपनी के बाहर किसी कर्मचारी या व्यक्ति का प्रतिरोध जता पाना असंभव हो जाएगा। यह भी ध्यान दिलाया गया है कि प्रतिरोध का मकसद अकसर कामकाज में व्यवधान डालना ही होता है, ताकि प्रतिरोध जता रहा व्यक्ति अपनी मांग की तरफ ध्यान खींच सके।
बिल में यह भी कहा गया है कि प्रदर्शनों या प्रतिरोध को जानबूझ कर और लापरवाह ढंग से “सार्वजनिक परेशानी” पैदा नहीं करनी चाहिए। इस प्रावधान के तहत आम लोगों या कुछ लोगों के कामकाज में बाधा डालना अपराध की श्रेणी में शामिल हो जाएगा। ऐसी स्थिति में पुलिस कार्रवाई कर सकेगी।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों का कहना है कि सरकार ने जानबूझ कर बिल के ज्यादातर हिस्से में भाषा को अस्पष्ट रखा है, ताकि पुलिस मनमाने ढंग से उसकी व्याख्या कर सके। विपक्षी सांसद डयाने एबॉट ने मीडिया से कहा- ‘ये कानून होता तो उसका इस्तेमाल मताधिकार की मांग करने वाले या ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के प्रदर्शनकारियों पर भी किया गया होता। लेकिन अगर वो प्रदर्शन नहीं हुए होते, तो आज हम दूसरी ही दुनिया में रह रहे होते। प्रदर्शनकारियों का मकसद ही व्यवधान पैदा करना होता है।’
बिल में शामिल संपत्ति के नुकसान से संबंधित प्रावधान में उन मूर्तियों को क्षतिग्रस्त करने का स्पष्ट जिक्र किया गया है, जिन पर पिछले साल ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के दौरान हमले हुए थे। इस कानून के तहत ऐसे हमलों को अपराध की सूची में रखा गया है। आलोचकों का कहना है कि सरकार इस बिल के जरिए अपने हाथ में अधिकारों को केंद्रित करने की कोशिश कर रही है। किंग्सटन यूनिवर्सिटी में अपराध विज्ञान के सीनियर लेक्चरर फ्रांसिस डॉडवर्थ ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘इस बिल को पेश करने से ऐसा लगता है कि सत्ताधारी उन प्रदर्शनों से निपटने के लिए अधिकार इकट्ठा कर रह हैं, जो समाज के रक्षक के रूप में उनकी छवि को चुनौती देते हैं।
ब्लैक लाइव्स मैटर और पिछले हफ्ते (एवरार्ड हत्याकांड को लेकर) हुए प्रदर्शनों में शामिल लोगों ने सीधे पुलिस की निंदा की थी। अनेक अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि लोग हिंसक प्रदर्शन पर तब उतरते हैं, जबकि उन्हें अपनी आत्म-छवि खतरे में नजर आती है। तब प्रदर्शनों के जरिए वे अपना नियंत्रण वापस पाना चाहते हैं।’
दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि वह सिर्फ कानून-व्यवस्था संबंधी कानून को आज के समय के मुताबिक ढालना चाहती है। लेकिन उसका इरादा चाहे जो हो, प्रस्तावित कानून ने ब्रिटिश सरकार को जनमत के कठघरे में खड़ा कर दिया है।