दक्षिण एशिया मामलों के जाने-माने विश्लेषक माइकल कुगेलमैन ने कहा है कि 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत को अपनी वैश्विक नेतृत्व क्षमता को फिर से स्थापित करने का एक शानदार अवसर देता है। दुनिया भर में बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत इस सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहा है। ऐसे में नई दिल्ली के पास विकासशील देशों यानी 'ग्लोबल साउथ' के साथ अपने संबंधों को और गहरा करने का यह सबसे सही समय है।
कुगेलमैन ने वैश्विक परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए बताया कि मौजूदा समय में दुनिया की आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था में अस्थिरता बहुत बढ़ गई है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को लेकर खासकर विकासशील देशों में असंतोष बढ़ रहा है और वे नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। ऐसे नाजुक दौर में इस सम्मेलन का आयोजन होना भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताओं के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है।
भारत के सामने क्या होंगी चुनौतीयां
हालांकि, कुगेलमैन ने यह भी आगाह किया कि समूह के विस्तार के कारण भारत के सामने आम सहमति बनाने की बड़ी कूटनीतिक चुनौती होगी। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन की सफलता इस बात से तय होगी कि क्या भारत एक ठोस साझा बयान जारी करवा पाता है या नहीं। संगठन में नए देशों के जुड़ने से अब किसी एक बिंदु पर सबकी सहमति जुटाना काफी पेचीदा हो गया है। उन्होंने यह भी कहा कि
'इस समूह की सदस्यता बढ़ने से इस बात की संभावना बढ़ गई है कि भविष्य में यह समूह बेअसर हो सकता है, क्योंकि समूह के लिए किसी मुद्दे पर आम सहमति तक पहुंचना मुश्किल हो जाएगा।'
इन दो प्रमुख चुनौतियों से निपटना नहीं होगा आसान
विश्लेषक के अनुसार, भारत को दो प्रमुख चुनौतियों से निपटना होगा। पहली चुनौती पश्चिम एशिया का तनाव और ईरान का युद्ध है, क्योंकि सम्मेलन में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) दोनों शामिल हो रहे हैं। दोनों के बीच तालमेल बिठाना आसान नहीं होगा। दूसरी बड़ी चुनौती अमेरिका से जुड़ा रुख है। रूस, ईरान और संभवतः चीन चाहते हैं कि साझा बयान में अमेरिका की कड़ी आलोचना हो। दूसरी तरफ, भारत और कुछ अन्य सदस्य ऐसा नहीं चाहेंगे, क्योंकि वे अमेरिका के साथ अपने संबंधों को सुरक्षित रखना चाहते हैं। विशेष तौर पर भारत अभी अमेरिका के साथ एक अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए बहुत ही संवेदनशील बातचीत कर रहा है।
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पीएम मोदी ने क्या कहा था?
इससे पहले शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स बिजनेस फोरम को संबोधित करते हुए कहा था कि जब पूरी दुनिया में व्यापारिक रुकावटें बढ़ रही हैं, तब भारत आर्थिक सहयोग के नए रास्ते बना रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ने ऊर्जा से लेकर तकनीक तक कई क्षेत्रों में अपनी आपूर्ति श्रृंखला को विविधतापूर्ण और मजबूत बनाया है। इसी वजह से वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी भारत दुनिया को विकास और स्थिरता का भरोसा दे रहा है। देश में सड़कों, रेलवे, बंदरगाहों और हवाई अड्डों का तेजी से विस्तार हो रहा है।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि वैश्विक व्यापार तभी आगे बढ़ सकता है जब समुद्री रास्ते सुरक्षित हों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। उन्होंने बताया कि भारत की अध्यक्षता का मुख्य विषय 'लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण' है, जिसे भारत ने पिछले 12 वर्षों से अपनी आर्थिक नीतियों का आधार बनाया है। प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि साल 2006 में शुरू हुआ ब्रिक्स अब काफी बड़ा हो चुका है और इसके सदस्य व साझेदार देशों की संख्या बढ़कर 21 हो गई है।