ये किसी को नहीं पता है कि ब्रेक्जिट कैसे होगा। साधारण शब्दों में कहें तो, जनमत संग्रह के ढाई साल बाद भी सांसद ये तय नहीं कर पाएं हैं कि इसके नतीजे का क्या करें। ये इतना ही सरल है और इसी से पता चलता है कि ब्रिटेन 1954 के बाद के सबसे बड़े राजनीतिक संकट में कैसे घिर रहा है लेकिन अगर कुछ नहीं हुआ तो इसका मतलब ये है कि ब्रिटेन को बिना समझौते के ही यूरोपीय संघ से अलग होना पड़ेगा।
और अगर अंत में टेरीजा मे बिना समझौते के यूरोपीय संघ से अलग होने के लिए तैयार न हो पाईं और अगर संसद इसे रोकने के लिए आतुर रही तो फिर किसी को नहीं पता कि क्या होगा। कुछ तो होगा, लेकिन क्या होगा, ये कहना अभी मुश्किल है।
मुख्य विपक्षी पार्टी में क्या चल रहा है?
ब्रेक्जिट ने न सिर्फ सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी में मतभेद पैदा किए हैं बल्कि मुख्य विपक्षी लेबर पार्टी में भी दरार डाल दी है। यूरोपीय संघ के विरोधी जेरेमी कोर्बिन की छाया में पार्टी नेतृत्व किसी भी तरह से यूरोपीय संघ से अलग होना चाहता है लेकिन पार्टी के अधिकतर सदस्य और समर्थक चाहते हैं कि दोबारा जनमत संग्रह हो और ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से अलग होने से रोका जाए।
जर्मनी के बैर्टेल्समन फाउंडेशन द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि ब्रेक्जिट के कारण ब्रिटेन को वार्षित 67 अरब यूरो का नुकसान होगा। इसके उलट अमेरिका जैसे देशों को इसका फायदा मिलेगा। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बिना समझौते के ईयू से बाहर होने पर ब्रिटेन में वस्तु और सेवाओं पर टैक्स लगेगा जो इस समय एकल बाजार व्यवस्था होने के कारण नहीं लग रहा है।
इससे वस्तु और सेवाएं महंगी होगी और लोगों के खर्च भी बढ़ेंगे जबकि आय में कमी होने का अनुमान है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इससे ब्रिटेन के लोगों की आय को लगभग 57 अरब यूरो का नुकसान होगा। जिसका भार ब्रिटेनवासियों पर प्रति व्यक्ति 873 यानि लगभग 67 हजार रुपए पड़ेगा।
अगर ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग होता है तो ईयू में सदस्य देशों की संख्या 27 होगी। यूरोपीय महाद्वीप में कुल 50 देश हैं जिनमें से कई देश अभी भी यूरोपीय संघ के सदस्य नहीं हैं