ब्राजील के मतदाताओं ने रविवार को वामपंथी राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा को चौथी बार सत्ता सौंपकर कहीं न कहीं यह संकेत दे दिया कि उन्हें अपनी नीतियों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दखल स्वीकार नहीं है। उन्होंने दूसरे दौर के मतदान में ट्रंप समर्थक दक्षिणपंथी उम्मीदवार फ्लेवियो बोल्सोनारो को अप्रत्याशित रूप से हरा दिया। फ्लेवियो, दक्षिणपंथी नेता और पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बड़े बेटे हैं।
लूला ने चार वर्ष पहले जायर बोल्सोनारो को हराया था। इस बार उनकी जीत को लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथी राजनीति के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। बोल्सोनारो ने चुनाव परिणाम स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। इससे चुनाव परिणाम को लेकर अशांति की आशंका बढ़ गई है। फ्लेवियो की हार ट्रंप के लिए झटका है। ट्रंप ने बोल्सोनारो परिवार और क्षेत्र में उभरती दक्षिणपंथी राजनीति का समर्थन किया था। इसके उलट लूला ने कई मुद्दों पर ट्रंप का खुलकर विरोध किया है। उनकी जीत बताती है कि पूरे क्षेत्र में लगातार हार के बावजूद वामपंथी ताकतों का प्रभाव बना हुआ है। महीने की शुरुआत में हुए पहले दौर के मतदान में लूला अपने प्रतिद्वंद्वी से दो प्रतिशत अंक पीछे रहे थे। रविवार को उन्होंने शानदार वापसी की। लगभग सभी मतों की गिनती के बाद लूला को 51.8% और बोल्सोनारो को 48.2% वोट मिले।
चीन-अमेरिका पर तकनीकी निर्भरता खत्म करने का वादा
जीत के बाद अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए लूला ने कहा, हम अधिक गणित, अधिक इंजीनियरिंग पढ़ाएंगे, क्योंकि मैं चीनी या अमेरिकी कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर निर्भर नहीं रहना चाहता। मैं ब्राजीलियाई एआई बनाना चाहता हूंं। लूला का बयान इस बात का संकेत है कि ब्राजील अब अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियों पर निर्भर नहीं रहना चाहता।
उन्होंने कहा कि अब दो ब्राजील नहीं हैं। वह केवल उन लोगों के राष्ट्रपति नहीं हैं जिन्होंने उन्हें वोट दिया, बल्कि सभी 21.5 करोड़ ब्राजीलियाई लोगों के राष्ट्रपति हैं। उन्होंने कहा, हमें एक ऐसे देश को फिर से जोड़ना है, जो विभाजित हो गया था।
सोशल मीडिया पर जलवा
पहले दौर के मतदान में उन्हें पीछे छोड़ने वाले बोल्सोनारो ने यूट्यूब के माध्यम से खूब प्रचार किया था। दूसरी तरफ, लूला ने 80 वर्ष की उम्र में अब स्मार्टफोन थामा है। दशकों तक मजदूरों के बीच राजनीति करने वाले लूला ने इस बार मोबाइल फोन के साथ सोशल मीडिया के मैदान में उतरे।
पहले दौर के चुनावी नतीजों के बाद 21 साल की कानून की छात्रा एना एलिसा सिल्वा उनकी करीबी टीम में शामिल हुईं। उसने लूला को सोशल मीडिया की दुनिया समझने और ऑनलाइन अपनी मौजूदगी मजबूत करने में मदद की और अब राष्ट्रपति सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं।
जूते पॉलिश करने से शीर्ष पद तक
लूला की वापसी उनके उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक कॅरिअर का नया अध्याय है। लोकप्रियता का शिखर देखा, भ्रष्टाचार के विवादों का सामना किया और जेल भी गए। उन्होंने कॅरिअर की शुरुआत जूते पॉलिश जैसे छोटे-मोटे कामों से की। फिर धातु उद्योग में मजदूर बने। मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाने लगे और राजनीति का बड़ा चेहरा बन गए। 1989 में पहरी बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ा। लूला की राजनीतिक ताकत हमेशा लोगों से सीधे जुड़ने की उनकी शैली रही है।
भारत के साथ साझेदारी मजबूत होगी
लूला के दोबारा चुने जाने से भारत-ब्राजील रणनीतिक साझेदारी को और मजबूती मिलने की उम्मीद है। दोनों देशों के बीच पूर्व में बनी सहमतियों और समझौतों पर निरंतरता बनी रहेगी। चीन पर निर्भरता घटाने में जुटे भारत के लिए ब्राजील के साथ दुर्लभ खनिजों के क्षेत्र में हुआ समझौता बेहद अहम है। इस दिशा में तय रूपरेखा पर काम जारी रहेगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार तथा विकासशील देशों की बेहतर नुमाइंदगी के लिए दोनों देश मिलकर दबाव बनाना जारी रखेंगे।
ब्रिक्स समूह के लिए बड़ी सफलता
लूला के नेतृत्व में ब्राजील हमेशा बहुध्रुवीय विश्व, व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल और ग्लोबल साउथ के साथ गहरे संबंधों की वकालत करता रहा है। रणनीतिक विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, अगर बोल्सोनारो जीत जाते तो ब्राजील संभवतः अमेरिका-नीत गठबंधनों के करीब चला जाता और ब्रिक्स में अपनी हिस्सेदारी घटा देता या बाहर हो जाता। लूला की जीत ने ट्रंप के दबाव वाली एकतरफा नीतियों के खिलाफ लैटिन अमेरिका का मजबूत सुरक्षा कवच बनाए रखा है।
दो वर्ष आंदोलन के बाद छात्र जीते लेकिन नेता कौन तय नहीं
एक लंबे समय से सत्ता पर काबिज अलेक्सांद्र वूचिच की ऐतिहासिक चुनावी हार के साथ ही सर्बिया ने सोमवार को एक नए दौर में कदम रख दिया। वूचिच ने रविवार देर रात जैसे ही अपनी हार स्वीकार की राजधानी बेलग्रेड और अन्य शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए। इसके साथ ही, लोकलुभावनवादी शासन के इस्तीफे की मांग को लेकर दो साल से जारी शांतिपूर्ण आंदोलन अपनी मंजिल पर पहुंच गया।
सर्बिया में सत्ता छात्र-नीत आंदोलन के हाथ में आ गई है लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नए नेता देश कैसे चलाएंगे। आंदोलन में विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, अभिनेता और किसान शामिल हैं लेकिन इसका कोई एक स्पष्ट चेहरा या नेता नहीं है। अभी यह साफ नहीं है कि अपनी घरेलू नीतियों (जैसे भ्रष्टाचार मिटाना और शिक्षा में सुधार करना) को लागू करने के लिए वे किसे प्रधानमंत्री और अन्य प्रमुख पदों पर नियुक्त करेंगे। राज्य चुनाव आयोग के अनुसार, 99% वोटों की गिनती के बाद छात्र समर्थित उम्मीदवारों को 52.7% वोट मिले, जबकि वूचिच की सर्बियाई प्रोग्रेसिव पार्टी (एसएनएस) गठबंधन को केवल 39.2% वोट हासिल हुए। 250 सीटों वाली संसद में छात्रों को 139 सीटें मिली हैं, जबकि वूचिच के गठबंधन के पास 97 सीटें बची हैं और बाकी सीटें अल्पसंख्यक दलों को मिली हैं।
भ्रष्टाचार के आरोपों में गंवानी पड़ी कुर्सी
वूचिच 2014 से प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के रूप में सर्बिया की राजनीति में हावी रहे थे। लेकिन नोवी साद शहर में एक रेलवे स्टेशन की छत गिरने से 16 लोगों की मौत के बाद भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों ने जन्म लिया, और छात्रों समर्थित उम्मीदवारों ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। वूचिच को रूसी राष्ट्रपति पुतिन का समर्थक माना जाता है।
अन्य देशों पर असर... सर्बिया में छात्रों की जीत को यूरोप में उभरे अन्य छात्र आंदोलनों के लिहाज से अहम माना जा रहा।