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Energy Crisis: लुटता यूरोप, चमकता अमेरिका, ऊर्जा संकट के चलते यूरोपीय देशों से भाग रही हैं बड़ी कंपनियां

Sat, 24 Sep 2022 05:00 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, एम्सटर्डम

सार

Energy Crisis: लग्जमबर्ग स्थित इस्पात कंपनी आर्सेलर मित्तल एसए ने इसी महीने जर्मनी स्थित अपने दो कारखानों में उत्पादन घटाने का एलान किया है। जबकि उसने कहा है कि अमेरिका के टेक्सस में स्थित उसके लौह उत्पादन कारखाने में अपेक्षा से अधिक उत्पादन हुआ है...
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Energy Crisis - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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यूरोप में गहरा रहे ऊर्जा संकट से सबसे ज्यादा फायदा अमेरिका को हो रहा है। प्राकृतिक गैस की आसमान छूती कीमतों के कारण यूरोपीय कंपनियां अपना कारोबार अमेरिका ले जा रही हैं। खास कर ऐसा स्टील, उर्वरक और पशु चारा का उत्पादन करने वाली कंपनियों के मामले में देखने को मिला है। जानकारों के मुताबिक अमेरिका में ऊर्जा की कीमत यूरोप की तुलना में ज्यादा स्थिर है। इसके अलावा हाल में वहां जो बाइडन प्रशासन ने अमेरिका में कारोबार लगाने वाली कंपनियों के लिए भारी सब्सिडी का एलान किया है। यूरोपीय कंपनियां इससे भी आकर्षित हुई हैं।

अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी एक विशेष रिपोर्ट में अर्थशास्त्रियों के हवाले से कहा है कि यूरोप में डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन (उद्योग धंधे खत्म होने) का एक नया दौर आने का अंदेशा गहरा गया है। इसी बीच अमेरिका ने मैनुफैक्चरिंग और ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में कई तरह के प्रोत्साहनों का एलान किया है। इनके तहत वहां केमिकल्स, बैटरी और अन्य ऊर्जा केंद्रित उत्पादों का कारखाना लगाने पर भारी सब्सिडी मिलेगी।

नीदरलैंड्स में एम्सटर्डम स्थित केमिकल फर्म ओसीआई एनवी के सीईओ अहमद अल-होशी ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा- ‘इसमें ज्यादा दिमाग लगाने वाली बात नहीं है। साफ है कि मौजूदा हालात में कंपनियां अपना कारोबार अमेरिका ही ले जाएंगी।’ हालांकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी रिकॉर्ड महंगाई, सप्लाई चेन संबंधी रुकावटों और मंदी की आशंका से जूझ रही है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि वहां स्थिति यूरोप और चीन से बेहतर है। चीन में जीरो कोविड नीति के कारण कारोबार में लगातार बाधा आ रही है।

डेनमार्क की जेवरात कंपनी पैंडोरा ए/एस और जर्मनी की ऑटोमोबिल निर्माता कंपनी फॉक्सवॉगन एजी ने इसी हफ्ते अमेरिका में अपना कारोबार बढ़ाने की घोषणा की। पिछले हफ्ते टेस्ला ने कहा था कि उसने जर्मनी में बैटरी उत्पादन की योजना रोक दी है। इसके बदले वह खुद को अमेरिका में नई घोषित कर रियायतों के योग्य बनाने की कोशिश कर रही है।

प्रमुख यूरोपीय कंपनी आरएचआई मैग्नेसिता एनवी के सीईओ स्टीफान बोर्गास ने कहा है- ‘मेरी राय में दो वर्षों तक हम समस्या से घिरे रहेंगे। अगर यूरोप सस्ती गैस का इंतजाम नहीं कर पाया या वह अक्षय ऊर्जा के पर्याप्त उत्पादन में नाकाम रहा, तो कंपनियां दूसरी जगह जाने लगेंगी।’ उन्होंने कहा- हम अमेरिका में अपना निवेश बढ़ा रहे हैं। अमेरिका के बारे में हमारी राय बहुत सकारात्मक है।

लग्जमबर्ग स्थित इस्पात कंपनी आर्सेलर मित्तल एसए ने इसी महीने जर्मनी स्थित अपने दो कारखानों में उत्पादन घटाने का एलान किया है। जबकि उसने कहा है कि अमेरिका के टेक्सस में स्थित उसके लौह उत्पादन कारखाने में अपेक्षा से अधिक उत्पादन हुआ है। वैसे कुछ कंपनियां इस मामले में सतर्क रुख अपना रही हैं। जर्मनी की केमिकल कंपनी बीएएसएफ के प्रवक्ता ने कहा- यह देखने के लिए इंतजार करना होगा कि अभी जो रहा है, वह ढांचागत बदलाव है या यह सिर्फ एक अस्थायी घटना है।

कई अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि रूसी गैस सप्लाई रुकने से हुई कमी की निकट भविष्य में भरपाई कर पाना यूरोप के लिए संभव नहीं होगा। कनाडा, अमेरिका और कतर से मंगाई जाने वाली गैस वैसे भी रूसी गैस की तुलना में काफी महंगी पड़ेगी। इसलिए 2024 तक आज जैसे ही हालात बने रहने का अनुमान है। इन बातों ने यूरोपीय कंपनियों की नींद उड़ा दी है। उनमें से कई ने अब अमेरिका का रुख कर लिया है।

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