चीन से प्रतिद्वंद्विता में मुकाबला करने के लिए अमेरिका का जो बाइडन प्रशासन सेमी कंडक्टर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अगली पीढ़ी की तकनीक के विकास को अहमियत देने की रणनीति अपनाने जा रहा है। अमेरिका का जोर ज्यादा संख्या में माइक्रोचिप्स के उत्पादन पर होगा। इन चिप्स का इस्तेमाल कार, मोबाइल फोन और रेफ्रिजरेटरों में भी होता है।
इनकी दुनिया में अचानक काफी कमी हो गई है। फिलहाल चीन उनकी सप्लाई का मुख्य स्रोत है। बाइडन प्रशासन की रणनीति अमेरिका के सहयोगी देशों को साथ लेकर सेमी कन्डक्टर फैब्रिकेशन और क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में आगे बढ़ने की है, ताकि परंपरागत तकनीक से ये देश आगे निकल सकें।
यहां के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने ताजा अमेरिकी तैयारियों के बारे में एक विशेष रिपोर्ट छापी है। ये रिपोर्ट अमेरिका के पूर्व सरकारी अधिकारियों और कुछ बाहरी विशेषज्ञों से बातचीत पर आधारित है। उनके मुताबिक बाइडन प्रशासन नई तकनीक के क्षेत्रों में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को आगे ले जाना चाहता है, ताकि इन तकनीक की वजह से नई बन रही अर्थव्यवस्था में भी पश्चिम का वर्चस्व बना रहे।
अमेरिकी संस्था 'जर्मन मार्शल फंड' में उभरती तकनीक के अध्ययनकर्ता लिंडसे गॉर्मैन ने कहा- सेमीकंडकक्टर्स के महत्व के बारे में एक नई समझ बनी है। सेमीकंडक्टर्स आज भू-राजनीतिक संघर्षों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। आज के युग में हर तकनीक किसी ना किसी चिप से संचालित होती है।
जानकारों का कहना है कि इस रणनीति का एक मकसद यह भी है कि जहां तक संभव हो चीन की पहुंच कुछ खास प्रकार की तकनीकों तक ना बनने दी जाए। चीन सरकार ने इन तकनीकों को विकसित करने के पीछे अपनी ताकत लगा रखी है। साथ ही हुवावे जैसी चीनी कंपनियां इस दिशा में आगे बढ़ रही हैँ। बताया जाता है कि पांच मार्च से शुरू हो रहे चीनी संसद- नेशलन पीपुल्स कांग्रेस के अधिवेशन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग नई तकनीकों के विकास की एक खास योजना पेश करेंगे।
अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के को-ऑर्डिनेटर कुर्त कैम्पबेल ने ऐसी रणनीति अपनाने पर जोर दिया है, जिसमें जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे अमेरिका के सहयोगी देशों को चिप फैब्रिकेशन के काम में शामिल किया जाए और अमेरिका को इस काम का केंद्र बनाया जाए। पश्चिमी रणनीतिकारों का आरोप है कि दुनिया में माइक्रोचिप की कमी इसलिए हुई है, क्योंकि चीन इनकी जमाखोरी कर रहा है।
कोरोना महामारी का भी इस पर असर हुआ। इस कमी की वजह से अमेरिका में कुछ ऑटोमेकर्स को अपने संयंत्र बंद करने पड़े। इससे अमेरिकी सप्लाई चेन की कमजोरी जग-जाहिर हो गई। इससे सामने आया कि इस मामले में अमेरिका और पश्चिमी देश एशियाई उत्पादकों पर निर्भर हैं। बाइडन प्रशासन अब इस कमी को दूर करना चाहता है।
बीते हफ्ते राष्ट्रपति जो बाइडन ने माइक्रोचिप्स के मामले में वैश्विक सप्लाई चेन की स्थिति की समीक्षा करने का आदेश दिया था। उन्होंने बड़े आकार की बैटरियों, दवाइयों, महत्वपूर्ण खनिज पदार्थों और रेयर अर्थ जैसी सामग्रियों के वैश्विक सप्लाई चेन की हालत की समीक्षा करने को भी कहा है। अधिकारियों ने कहा है कि नई अमेरिकी रणनीति का स्वरूप क्या होगा, इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन अमेरिकी पत्रिका फॉरेन अफेयर्स ने कहा है कि अब टेक्नो- ऑटोक्रेसी (तानाशाही शासन की तकनीक) को टेक्नो- डेमोक्रेसी की चुनौती मिलने जा रही है।
दो हफ्ते पहले अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नर्ड प्राइस ने कहा था- ‘हमें मिल कर चीन के दुरुपयोग, उसके शोषक व्यवहार और उसके उन निर्यात उपकरणों का मुकाबला करना होगा, जिनके जरिए वह टेक्नो तानाशाही को आगे बढ़ा रहा है।’ अब ये साफ है कि बाइडन प्रशासन ने इस मुकाबले में उतरने के लिए कमर कस ली है।