देश के केंद्रीय चुनाव आयोग के अनुसार इस साल हुए चुनाव में लुकाशेंको को जहां 80.1 फीसदी मत मिले वहीं स्वेतलाना को मजह 10.12 फीसदी मत मिले। स्वेतलाना ने मतगणना में धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए कहा है कि जिन इलाकों में मतगणना सही तरीके से हुई है वहां उन्होंने 60 से 70 फीसदी तक मत हासिल किए हैं। देश के वर्तमान हालात देखें तो जनता भी यही कह रही है।
चुनाव परिणाम आने के बाद स्वेतलाना ने कहा था कि उन्हें आंकड़ों पर विश्वास नहीं हो रहा है। बता दें कि उम्मीदवारी तय होने के कुछ दिनों में ही उनकी रैलियों में भारी भीड़ जमा होने लगी थी। 30 जुलाई को मिंस्क में एक आयोजन में करीब 63 हजार लोग शामिल हुए थे। उन छोटे कस्बों में भी उन्हें समर्थन मिला था, जहां अभी तक कोई विपक्षी उम्मीदवार कदम तक नहीं जमा पाया था।
बेलारूस पहले सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था। 25 अगस्त 1991 को यह सोवियत संघ से अलग हुआ और स्वतंत्र देश बना। साल 1994 में यहां का अलग संविधान बना। इसके तहत देश में राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था तय की गई। जून 1994 में बेलारूस में पहला राष्ट्रपति चुनाव हुआ, जिसमें लुकाशेंको ने जीत हासिल की। तब से लेकर अब तक वही राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे हैं।
ऐसी स्थितियों में जब चुनाव प्रचार के दौरान किसी प्रत्याशी को अभूतपूर्व समर्थन मिले और मतगणना में महज 10 फीसदी वोट मिलें तो शंका अनायास ही उत्पन्न हो जाती है। दो बच्चों की मां स्वेतलाना (37) को उनके चुनाव लड़ने का फैसला लेने के बाद से ही धमकियां मिलने का दौर भी शुरू हो गया था। इसके चलते उन्हें अपने बच्चों को दादी के साथ देश के बाहर भेजना पड़ा था।
लुकाशेंको के खिलाफ जनता में आक्रोश एकाएक नहीं पनपा है। जब पूरे यूरोप में कोरोना वायरस की वजह से संकट का माहौल था तब उन्होंने इसे महज एक मनोविकृति करार दिया था। उन्होंने वोदका का एक शॉट और ट्रैक्टर की सवारी को कोरोना समेत सभी बीमारियों का इलाज बता दिया था। आधिकारिक स्तर पर वहां कोरोना से बचने के कोई कदम ही नहीं उठाए गए।
जब बेलारूस के लोगों ने देखा कि पड़ोसी देश प्रतिबंध लागू कर रहे हैं और अपनी सीमाओं को भी बंद कर रहे हैं तो उन्होंने खुद संकट को समझा और नियमों का पालन करने का फैसला किया। उन्होंने मास्क पहनना, बच्चों को स्कूल न भेजने का फैसला और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे नियमों का पालन स्वयं ही करना शुरू किया था। इससे लोगों में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न हुई।
राष्ट्रपति लुकाशेंको के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों में बेलारूल का मीडिया भी शामिल हो गया है। बीते सोमवार को बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी हड़ताल पर रहे थे। मीडियाकर्मी नए सिरे से चुनाव और टेलीविजन सेंसरशिप हटाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जाती हैं तब तक वह काम पर नहीं लौटेंगे। कुछ पत्रकारों ने चुनाव से पहले भी इस्तीफा दिया था।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार को समर्थन देने वाले राष्ट्रीय चैनल बेलारूस वन के करीब 300 कर्मी इस्तीफा दे चुके हैं। उनका कहना है कि वह सरकार की प्रचार के लिए मशीनरी बनकर काम नहीं कर सकते हैं। पत्रकारों का कहना गै कि अगर वह ईमानदारी से पत्रकारिता नहीं कर सकते हैं तो वह काम ही नहीं करेंगे। बेलारूस में करीब-करीब पूरा मीडिया सरकार के नियंत्रण में है।
दोबारा चुनाव को लेकर लुकाशेंको ने अपना रुख साफ कर दिया है कि वह किसी कीमत पर ऐसा नहीं होने देंगे। लुकाशेंको ने प्रदर्शनकारियों से कह दिया है कि देश में दोबारा चुनाव तब तक नहीं होंगे जब कर मुझे गोली नहीं मार दी जाएगी। उनका कहना है कि इन प्रदर्शनों से देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो रही है और अगर वह पद छोड़ते हैं तो स्थिति बहुत खराब हो जाएगी।
सोमवार को समर्थन जुटाने के लिए लुकाशेंको ने एक कारखाने का दौरा किया था लेकिन वहां भी उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा था। रिपोर्ट्स के अनुसार कर्मचारियों ने वापस जाओ के नारे लगाते हुए उनके साथ धक्का-मुक्की भी की। इस पर लुकाशेंको ने कहा कि जो हड़ताल पर जाना चाहे वह जा सकता है, मैं कभी दबाव में नहीं आऊंगा, सरकार नहीं गिरेगी।
राष्ट्रपति लुकाशेंको का विवादित बयान देने में भी कोई जवाब नहीं है। स्वेतलाना अपने नामांकन के लिए समर्थन एकत्र कर रही थीं, लुकाशेंको ने एक भाषण में कहा था कि उन्हें पूरा भरोसा है बेलारूस का अगला राष्ट्रपति एक पुरुष ही होगा। उन्होंने कहा था, 'हमारा संविधान महिलाओं के लिए नहीं है। हमारा समाज इतना परिपक्व नहीं है कि महिलाओं को वोट दे।'
बेलारूस के पड़ोसी देश रूस ने यहां चल रहे संकट को लेकर कहा है कि दुनिया के दूसरे देशों को बेलारूस संकट से दूर रहना चाहिए। लुकाशेंको को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का करीबी माना जाता है। इसीलिए पुतिन चाहते हैं कि अन्य देश इस विवाद से दूर रहें। रूस ने कहा है कि अगर जरूरत पड़ी तो वह लुकाशेंको को सैन्य मदद भी उपलब्ध कराएगा।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार जर्मनी ने कहा है कि वह बेलारूस पर यूरोपीय यूनियन के प्रतिबंधों के विस्तार के समर्थन में हैं। यूरोपीय यूनियन के नेताओंने शुक्रवार को बेलारूस पर नए प्रतिबंधों की एक सूची बनाने पर सहमति जताई थी। बता दें कि यूरोपीय यूनियन की रोटेटिंग प्रेसीडेंसी अभी जर्मनी के पास है। जर्मनी ने प्रदर्शनों को बदलाव लाने वाला बताया है।
जर्मनी की सरकार के प्रवक्ता स्टीफेन सीबर्ट ने प्रदर्शन कर रहे लोगों को और प्रदर्शनों को प्रभावशाली और बदलाव लाने वाला कहा है। उन्होंने हिंसा को तुरंत खत्म करने की और राजनीतिक कैदियों को रिहा करने की मांग की है। सीबर्ट ने कहा है कि यूरोप प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ा है। संकट कम करने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की बातचीत का सुझाव दिया है।
सीबर्ट ने कहा, ऑर्गेनाइजेशन फॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप (ओएससीई) चुनाव की समीक्षा करने में अहम भूमिका निभा सकता है। ओएससीई ने साल 2001 में एक निरीक्षक को बेलारूस भेजा था, लेकिन चुनाव की निगरानी के लिए उन्हें नहीं बुलाया गया था। माना जा रहा है कि बेलारूस को लेकर रूस और बाकी देशों के बीच विवाद नए संकट को जन्म दे सकता है।
अमेरिका में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बिडेन ने भी प्रदर्शनकारियों के प्रति समर्थन जताया है। उन्होंने कहा, बेलारूस के बहादुर नागरिक अपनी आवाज उठा रहे हैं। ये आवाजें आतंक या प्रताड़ना से नहीं दबेंगी। अमेरिका को स्वेतलाना तिखानोव्स्काया की पारदर्शी चुनाव कराने की मांग का समर्थन करना चाहिए। रूस को इस मामले में कतई दखल नहीं देना चाहिए। यह भूराजनीति नहीं बल्कि नेता चुनने के अधिकार को लेकर है।