इंडोनेशिया में नकाब खत्म करने की पहल को लेकर शुरू हुई बहस इस साल किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। जानकारों का कहना है कि दुनिया में मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी वाला ये देश अब नए साल में भी इस सवाल में उलझा रहेगा। इस साल के मध्य में सेना के रिटायर्ड जनरल फचरुल रजी को इंडोनेशिया की सरकार में धार्मिक मामलों का मंत्री बनाया गया था। ये पद संभालने के हफ्ते भर के अंदर रजी ने सरकारी दफ्तरों में बुर्का और पुरुषों के क्रॉप्ड पैंट पहनने पर रोक लगाने का सुझाव दे दिया। इससे देश में विवाद भड़क उठा।
इंडोनेशिया में अब कट्टरपंथी मुस्लिम गुटों की ताकत काफी ज्यादा है। धार्मिक मामलों में उनकी मर्जी के खिलाफ किसी नियम को लागू करना आसान नहीं है। इसके बावजूद इंडोनेशियाई संविधान के मुताबिक ये देश एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है। गुजरे दशकों में सार्वजनिक जगहों पर इस्लामी पहचान को स्पष्ट करने वाले परिधान पहनने का चलन इंडोनेशिया में नहीं था। लेकिन हाल के वर्षों में कट्टरपंथी गुटों की बढ़ती ताकत के साथ ये चलन भी बढ़ता गया है।
पिछले कुछ वर्षों में यह शिकायत भी बढ़ी है कि कट्टरपंथी गुटों ने सरकारी दफ्तरों और प्रतिष्ठानों में घुसपैठ कर ली है। 2017 में हुए एक सर्वे में पाया गया कि सरकारी दफ्तरों और प्रतिष्ठानों में मौजूद 100 मस्जिदों में से लगभग आधी में कट्टरपंथी सोच हावी हो गई है। ऐसी कई मस्जिदों पर चरमपंथ फैलाने के आरोप भी लगे हैं। इसी के मद्देनजर राष्ट्रपति जोको विडोडो ने रजी को कट्टरपंथ से निपटने की जिम्मेदारी सौंपी है। रजी ऐसा करने का संकल्प लगातार जताते रहे हैं।
कुछ समय पहले एक भाषण के दौरान रजी ने कहा कि रूढ़िवादी परिधानों का संबंध इस्लामी राज कायम करने के अभियान से है। इंडोनेशिया में पहले इस्लामी राज की चर्चा प्रतिबंधित समझी जाती थी। लेकिन अब कई गुट इसकी खुल कर वकालत कर रहे हैं। रजी ने अपने भाषण में कहा कि सरकारी कर्मचारी और सैनिक अगर ऐसे परिधान पहनते हैं, तो इसका मतलब है कि वे सरकारी नियम का पालन नहीं करते। ऐसे लोगों को नौकरी छोड़ देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जो इस्लामी राज कायम करना चाहते हैं, वे इंडोनेशियाई राष्ट्र के अंदर एक और राष्ट्र के विचार का समर्थन कर रहे हैं। लेकिन सरकारी कर्मी सरकार से तनख्वाह लेते हैं। उन्हें इंडोनेशिया का सम्मान करना होगा या फिर नौकरी छोड़नी होगी।
इस भाषण के बाद से रजी इस्लामिक गुटों के निशाने पर हैं। उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है। वैसे खुद रजी की नियुक्ति पर भी विवाद उठा था। परंपरागत रूप से इंडोनेशिया में धार्मिक मामलों का मंत्रालय देश के सबसे बड़े मुस्लिम समूह- नदाहुल उलमा के नुमाइंदे को मिलता रहा है। लेकिन रजी का इस समूह से कोई संबंध नहीं है। वे सेना के रिटायर्ड जनरल हैं। इसलिए उनकी नियुक्ति पर मुस्लिम गुटों ने नाराजगी जताई थी।
रजी को इसलिए ये मंत्रालय सौंपा गया, क्योंकि राष्ट्रपति विडोडो ने इस्लामी कट्टरपंथ से मुकाबले को अपने एजेंडे में काफी ऊपर रखा है। यूनिवर्सिटी ऑफ इंडोनेशिया में इस्लामी मामलों के विशेषज्ञ योन माचमुदी ने एक अखबार से कहा- मेरी राय में देश में उग्रवाद बढ़ रहा है। सरकार अब धार्मिक मामलों से निपटने के लिए सुरक्षा का नजरिया अपना रही है।
इंडोनेशिया में धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था पूर्व तानाशाह सुहार्तो ने लागू की थी। उनके तीन दशकों के शासन के दौरान मजहबी कट्टरपंथ को लगभग कुचल दिया गया था। तब सरकार ने सिर्फ नदाहुल उलमा जैसे कुछ समूहों को ही इस्लामी गुट के रूप में मान्यता दी थी। इन समूहों को धार्मिक प्रचार करने की आजादी थी। ये गुट उदार और समावेशी इस्लाम का प्रचार करते थे। 1998 में सुहार्तो को पद से हटाए जाने के बाद देश में लोकतंत्र की स्थापना हुई। उसके साथ ही कट्टरपंथी इस्लामी गुटों को खड़ा होने की जगह मिली। पिछले कुछ वर्षों में यह ट्रेंड काफी तेज हो गया है।
राष्ट्रपति विडोडो इससे देश को मुक्ति दिलाना चाहते हैँ। इसके लिए उन्होंने कई ठोस कदम उठाए हैं, जिनमें एक फचरुल रजी की नियुक्ति भी है। इससे देश में विवाद खड़े हुए हैं। 2020 में इससे जुड़ी बहस में देश उलझा रहा। जानकारों का कहना है कि नए साल में भी इंडोनेशिया को इससे निजात नहीं मिलने वाली है।