अमेरिका में बैंकिंग संकट बढ़ने के साथ दक्षिण-पूर्व एशियाई कंपनियों के लिए फंड का स्रोत सूख गया है। अमेरिका की वेंचर कैपिटल कंपनियों में एक नया ट्रेंड भी यह देखने को मिला है कि उनकी पश्चिम एशिया में निवेश करने में ज्यादा दिलचस्पी बन गई है। इस कारण भी अब स्टार्टअप कंपनियों को अपने ही दूसरे स्थानों पर फंड की तलाश करनी पड़ रही है। इस घटनाक्रम से खासकर भारत के स्टार्टअप्स को दिक्कत पेश आ रही है।
वित्त बाजार के विश्लेषकों के मुताबिक भारत जैसे देशों के स्टार्टअप्स के लिए दिक्कत की शुरुआत 2022 की दूसरी छमाही में हुई। जबकि इसके पहले दो साल तक इन कंपनियों को बड़ी आसानी से अमेरिकी फंड मिल रहा था। बेंगलुरु स्थित एक उद्यमी ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से बातचीत में कहा- ‘अमेरिकी निवेशकों ने अब मानदंड बहुत ऊंचे कर दिए हैं। इसका एक कारण उनके अपने हाथ तंग हो जाना है। अमेरिका से अब पैसा उठाना हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला पाने जितना कठिन हो गया है।’
निक्कईएशिया के मुताबिक हाल में भारतीय उद्यमियों को इन दिनों बार अबू धाबी और दुबई के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। वे इस उम्मीद में वहां जाते हैं कि पश्चिमी एशिया के निवशकों को तेल से ध्यान हटा कर टेक्नोलॉजी में निवेश के लिए राजी किया जा सकेगा। पिछले वर्ष नवंबर में अबू धाबी के अल-मारयाह द्वीप पर आयोजित वित्त सप्ताह में भाग लेने के लिए 50 से ज्यादा भारतीय स्टार्टअप कंपनियों के अधिकारी गए थे। अबू धाबी स्थित एक निवेशक के मुताबिक, ‘भारत में निवेश के लिए विकल्प मौजूद हैं, लेकिन उनमें अभी और बढ़ोतरी की जरूरत है।’
भारतीय उद्यमियों के लिए उम्मीद का एक स्रोत दक्षिण-पूर्व एशिया है। वहां उनकी नजर उन निवेशकों पर है, जो चीन से अपना पैसा निकालना चाहते हैं। इन निवेशकों को यह बताने की कोशिश की गई है कि भारत में आज निवेश और उससे मुनाफे की उतनी ही संभावनाएं हैं, जितनी एक समय चीन से थी। अब चीन में नीतियां बहुत सख्त हो गई हैं, ऐसे में भारत निवेश के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है।
सीबी इनसाइट्स नाम की एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक भारत के स्टार्टअप्स के लिए फंडिंग में पिछले साल एक तिहाई की गिरावट आई। 2021 में जहां इन कंपनियों के लिए 30.5 बिलियन डॉलर की फंडिंग उपलब्ध हुई थी, जो पिछले साल 20.7 बिलियन डॉलर रह गई। भारत में 2020 में 526 स्टार्टअप कंपनियां थीं। यह संख्या 2021 में 665 तक पहुंच गई। सीबी इनसाइट्स के मुताबिक में 85 से ज्यादा ऐसी स्टार्टअप कंपनियां हैं, जिनमें एक से छह करोड़ डॉलर तक का निवेश है। दुनिया के पैमाने पर देखा जाए, तो इतनी रकम को छोटे निवेश की श्रेणी में रखा जाता है।
जानकारों के मुताबिक पिछले साल का ट्रेंड यह है कि एशियाई स्टार्टअप उद्यमों के लिए शेयर बाजार से पैसा जुटाना भी मुश्किल हो रहा है। पिछले साल कम से कम दस भारतीय कंपनियों को आईपीओ (इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग) लाने का इरादा छोड़ना पड़ा। ऐसा दुनिया भर में टेक कंपनियों के लिए बढ़ी मुसीबत के कारण हुआ है।