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बांग्लादेश: महंगाई की मार से परेशान आम नागरिक, गरीबी की तरफ जा रहा देश का मध्य वर्ग

Wed, 13 Apr 2022 01:03 PM IST
प्रांजुल श्रीवास्तव वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ढाका

सार

महंगाई बढ़ने के कारण हर व्यक्ति की क्रय शक्ति घटी है। एक प्राइवेट बैंक में सीनियर ऑफिसर मोहम्मद अब्दुल हई ने अखबार डेली स्टार से कहा- ‘मेरी तनख्वाह साठ हजार रुपये महीना है। इससे मेरे लिए अपने परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो गया है।
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बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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तेजी से बढ़ रही महंगाई की बांग्लादेश के मध्य वर्ग पर कड़ी मार पड़ रही है। इस तबके की मुश्किल यह भी है कि इसे आम तौर पर सरकार की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ नहीं मिलता। ऐसे में जरूरी चीजों और सेवाओं के दाम बढ़ने से उसका बजट गड़बड़ा गया है। बांग्लादेश में बीते जनवरी में मुद्रास्फीति दर 5.6 फीसदी थी। फरवरी में यह 6.17 प्रतिशत हो गई। मार्च के आंकड़े अभी नहीं आए हैं। लेकिन रोजमर्रा के तजुर्बे के आधार पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि पिछले महीने महंगाई और बढ़ी।

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महंगाई बढ़ने के कारण हर व्यक्ति की क्रय शक्ति घटी है। एक प्राइवेट बैंक में सीनियर ऑफिसर मोहम्मद अब्दुल हई ने अखबार डेली स्टार से कहा- ‘मेरी तनख्वाह साठ हजार रुपये महीना है। इससे मेरे लिए अपने परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो गया है। बच्चों की अच्छी शिक्षा देना कठिन होता जा रहा है। इसीलिए महंगाई की खबरें पढ़ते समय में नवर्स हो जाता हूं।’

योजनाओं में मध्य वर्ग को किया जाए शामिल
विशेषज्ञों ने भी मध्य वर्ग की बिगड़ती हालत पर चिंता जताई है। उन्होंने सुझाव दिया है कि इस तबके के लोगों को भी सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं में शामिल किया जाए। वरना, बहुत से मध्य वर्ग के लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाने के कगार पर पहुंच जाएंगे। थिंक टैंक पॉवर एंड पार्टिसिपेशन रिसर्च सेंटर के कार्यकारी अध्यक्ष हुसैन जिल्लुर रहमान ने डेली स्टार से कहा- मुद्रास्फीति बढ़ने का गरीब परिवारों पर वास्तविक असर उससे कहीं ज्यादा है, जितना सरकारी आंकड़ों में नजर आता है। अब इसकी मार मध्य वर्ग पर भी पड़ने लगी है, क्योंकि उसकी आमदनी भी नहीं बढ़ी है।
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प्राइवेट सेक्टर की मदद करे सरकार
ढाका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक प्रो. बजलुल हक खोंडकर के मुताबिक बांग्लादेश की सत्तर फीसदी आबादी के पास मौजूदा स्थिति को झेलने की वित्तीय क्षमता नहीं है। आबादी का इतना बड़ा हिस्सा सरकार की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में भी नहीं है। आबादी के इस हिस्से को खुले बाजार में जरूरी चीजों की बिक्री की योजनाएं चलाने से कोई फायदा नहीं होगा।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) से जुड़ीं विश्लेषक डॉ नाजनीन अहमद ने कहा- ‘सरकार के पास एक विकल्प यह है कि वह प्राइवेट सेक्टर की मदद करे, ताकि मध्य वर्ग के लिए रोजगार के अवसर बढ़ सकें। संकट से घिरे परिवारों को वह लघु ऋण भी मुहैया करा सकती है।’

हुसैन जिल्लुर ने कहा है कि सरकार को सबसे पहले जरूरतमंद लोगों के बारे में विश्वसनीय आंकड़े इकट्ठे करने चाहिए। उसके बाद उसे सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं को फिर से लागू करना चाहिए। उन्होंने कहा- ‘पिछले साल सराकर ने 50 लाख परिवारों को ढाई हजार टका देने की घोषणा की थी। लेकिन अंततः ये रकम सिर्फ 34 लाख परिवारों तक पहुंच पाई। इसके बीच आरोप लगे कि लाभार्थियों की लिस्ट तैयार करने में भ्रष्टाचार हुआ है।’

विशेषज्ञों का कहना है कि आज मध्य वर्ग की आय का ज्यादा हिस्सा खाने-पीने की चीजें खरीदने पर खर्च हो जा रहा है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि इस खर्च को घटाया जाए। एक विशेषज्ञ ने कहा- लोग अब मछली, मांस या ऐसे महंगे खाद्य खरीदने से बचने लगे हैं, क्योंकि बिजली या गैस का बिल चुकाना और परिवहन के लिए रकम बचाना उनकी प्राथमिकता बन गया है।

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