एक्सिओम मिशन के जरिए आईएसएस पर पहुंचे भारत के शुभांशु शुक्ला।
- फोटो : अमर उजाला
एक्सिओम मिशम के क्रू मेंबर
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भारत को कैसे होगा शुभांशु के इस मिशन से फायदा?
1. अंतरिक्ष में होने वाले एक्सपेरिमेंट
एग्जियोम मिशन पर भारत को सबसे ज्यादा फायदा आईएसएस पर शुभांशु शुक्ल की तरफ से किए जाने वाले एक्सपेरिमेंट्स के जरिए होगा। अब तक मिली जानकारी के मुताबिक, शुभांशु आईएसएस पर कुल सात एक्सपेरिमेंट्स करेंगे। इन सभी प्रयोगों के जरिए अंतरिक्ष और पृथ्वी में जीवन के फर्क को लेकर अहम जानकारियां मिलेंगी।
प्रयोग-1: छह फसलों के बीज का परीक्षण
शुभांशु आईएसएस पर छह तरह की फसलों के बीच साथ लेकर गए हैं। अपने 14 दिन के सफर के दौरान वे इन बीजों के माइक्रोग्रैविटी में विकास को लेकर अहम जानकारी इकट्ठा करेंगे। इस प्रयोग का मकसद आने वाले समय में अंतरिक्ष में खेती करने के विकल्पों को तलाशना होगा।
प्रयोग-2: काई के इस्तेमाल पर एक्सपेरिमेंट
शुभांशु अपने मिशन के लिए माइक्रोएल्गी (Microalgae) यानी काई के तीन स्ट्रेन लेकर पहुंचे हैं। वे कम गुरुत्वाकर्षण के बीच इन्हें खाने, ईंधन और लंबी अवधि के अंतरिक्ष मिशन के दौरान जीवन बचाने के विकल्प के तौर पर प्रयोग में लाएंगे।
प्रयोग-3: कठिन परिस्थितियों में जीवाश्मों के सुरक्षित रहने पर
एग्जियोम-4 के मिशन में शुभांशु टार्डीग्रेड्स (एक तरह का छोटा जीव, जो कि चरम स्थितियों में भी खुद को सामान्य रख सकता है) पर परीक्षण करेंगे। इसके जरिए यह जानने की कोशिश की जाएगी कि अंतरिक्ष के खतरनाक माहौल में कौन से जीवाणु सुरक्षित रह सकते हैं।
प्रयोग-4: मांसपेशियों के कमजोर होने पर
एक और प्रयोग के जरिए यह जानने की कोशिश की जाएगी कि शून्य गुरुत्वाकर्षण में इंसानों में मांस कैसे कम होता है और इससे निपटा कैसे जा सकता है। आमतौर पर लंबी अवधि के मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों को मसल एट्रोफी यानी मांस घटने की शिकायत आती है। ऐसे में अंतरिक्षयात्रियों पर पाचन से जुड़े सप्लीमेंट्स का असर देखा जाएगा।
प्रयोग-5: आंखों पर पड़ने वाला प्रभाव
एग्जियोम-4 मिशन के दौरान एक स्टडी माइक्रोग्रैविटी के आंखों पर पड़ने वाले प्रभाव पर भी की जाएगी। इस रिसर्च में यह पता लगाया जाएगा कि अंतरिक्ष में एस्ट्रोनॉट्स की आंखों की पुतलियों का मूवमेंट किस हद तक प्रभावित होता है। साथ ही इससे किसी की तनाव और सजगता कितनी प्रभावित होती है।
प्रयोग-6: अलग-अलग फसलों की पोषण गुणवत्ता
मिशन के दौरान कुछ बीजों को अंकुरित करने का प्रयास किया जाएगा। इनके पोषक तत्वों को भी मापा जाएगा, जिससे पृथ्वी और जीरो ग्रैविटी में पैदा हुई फसलों के पोषण में अंतर को समझने का प्रयास किया जाएगा। यह प्रयोग भविष्य में अंतरिक्ष यात्रियों के बोझ को घटाएगा, क्योंकि अगर अंतरिक्ष में फसलें बराबर या ज्यादा मात्रा में पोषक होती हैं, तो इन्हें वहीं उगाने की कोशिश की जाएगी।
प्रयोग-7: यूरिया और नाइट्रेट में सायनोबैक्टेरिया का इस्तेमाल
शुभांशु शुक्ल के सबसे कठिन प्रयोगों में से यह एक रहेगा। दरअसल, अंतरिक्ष में खाना, पानी और ऑक्सीजन की उपलब्धता बड़ी समस्या रही है। खासकर लंबी अवधि के अभियानों के लिए। ऐसे में वैज्ञानिक काफी समय से आईएसएस पर ही इन चीजों की व्यवस्था की कोशिशों में जुटे हैं। अब यूरिया और नाइट्रेट में सायनोबैक्टीरिया का इस्तेमाल कर वैज्ञानिक यह देखने की कोशिश में हैं कि क्या अंतरिक्ष की जीरो ग्रैविटी में खाना और ऑक्सीजन एक साथ पैदा किए जा सकते हैं। गौरतलब है कि यूरिया और नाइट्रेट दोनों ही खाना बनाने के लिए अहम हैं।