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आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस में बेताज बादशाह हो जाएगा चीन

Sun, 30 Jul 2017 04:08 PM IST
बीबीसी हिन्दी
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चीन उच्च तकनीक वाले आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस पर आधारित क्रूज़ मिसाइल का विकास कर रहा है।
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चीन की सरकार अब आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर ख़ास ज़ोर दे रही है । इस क्षेत्र में अगले दशक तक वैश्विक अगुवा बनने की योजना के तहत पिछले हफ़्ते चीन ने एक महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है।
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इंसान की ज़िंदगी में मशीनी इंक़लाब आने वाला है। इसके अनुसार, 2020 तक चीन एआई टेक्नोलॉजी में रफ़्तार पकड़ लेगा, 2025 तक वो बड़ी उपलब्धियां हासिल कर लेगा और 2030 तक दुनिया का बेताज़ बादशाह हो जाएगा। लंबे समय से एआई को रचनात्मकता और विकास के अग्रिम मोर्चे के रूप में देखा जाता रहा है क्योंकि इसका इस्तेमाल बहुत सारे क्षेत्रों में हो सकता है।


अर्थशास्त्री लगातार इस बात को कह रहे हैं कि चीनी अर्थव्यवस्था पर ठहराव का ख़तरा मंडरा रहा है और उसे जल्द ही इसमें जान फूंकने के लिए कुछ नए रचनात्मक तरीक़े अपनाने होंगे। चीनी प्रशासन भी मैन्यूफ़ैक्चरिंग आधारित मॉडल से हाईटेक आधारित मॉडल पर अर्थव्यवस्था को फिर से संगठित करने की कोशिश कर रहा है। और इस रणनीति में एआई को अहमियत दी जा रही है।
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चीन की कैबिनेट- स्टेट काउंसिल ने हाल ही में अपने बयान में कहा है कि एक शीर्ष रचनात्मक देश और आर्थिक शक्ति के रूप में चीन को स्थापित करने के लिए टेक्नोलॉजी महत्वपूर्ण है। डाटा का विशाल खजाना है चीन के पास एआई पर ज़ोर देने के पीछे, इसके विशाल डाटा खजाने को भी इस्तेमाल करने की इच्छा शामिल है। देश के पास 73 करोड़ इंटरनेट यूज़र्स हैं और दुनिया में यहां सबसे ज़्यादा स्मार्ट फ़ोन यूज़र्स हैं।


इतना विशाल डाटा नेटवर्क, स्थानीय एआई डेवलपर्स को टेस्ट और टेक्नोलॉजी में सुधार का बेहतरीन मौका देता है। डाटाबेस के लगातार और बड़े होते जाने की वजह से ही चीन में बीते जून में ही नया साइबर सिक्योरिटी क़ानून लाया गया है।


इसके तहत कंपनियों के लिए, यूज़र्स के डाटा को चीन के अंदर मौजूद सर्वर पर ही डाटा डालने को अनिवार्य बनाया गया है। स्थानीय कंपनियों ने भी भविष्य में आने वाले मौके को भांपते हुए एआई में तेज़ी से निवेश करना शुरू कर दिया है।


चीन तीन बड़ी टेक कंपनियों- बाइदू, टेंसेंट और अलीबाबा ने एआई में भारी निवेश किया है। बाइदू के अध्यक्ष झांग याकिन के अनुसार, इस क्षेत्र में चीन जल्द ही अमरीका को पीछे छोड़ देगा। आईआईमीडिया रिसर्च के अनुसार, चीन के एआई उद्योग की 2016 में विकास दर 43।3 प्रतिशत थी और कुल व्यापार 1।47 अरब डॉलर के पार कर गया था। साल 2017 और 2019 में इसके 2।2 अरब डॉलर और 5।1 अरब डॉलर हो जाने की उम्मीद है।
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आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस
लेकिन आलोचकों का कहना है कि एआई से संबंधित उपकरण असल में चीन के सेंसरशिप में ही मदद करेंगे और ऑनलाइन सामग्रियों पर प्रतिबंध का दायरा बढ़ेगा। चीन के नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ डिफ़ेंस टेक्नोलॉजी के प्रोफ़ेसर झू क्विचाओ के अनुसार, "एआई में रक्षा तकनीक को काल्पनिक से सच्चाई में पूरी तरह बदल देने की क्षमता है और इस पहलू को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।" चीनी सरकार ने पहले ही रक्षा क्षेत्र में टेक्नोलॉजी को शामिल किए जाने का आह्वान किया है।


स्टेट काउंसिल की योजना के अनुसार, "विकास के नए चरण में हमें आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस को शामिल किए जाने के मौके का ज़रूर फायदा उठाना चाहिए।" चीन का स्वदेशी रक्षा उद्योग पहले ही मिसाइल से लेकर ड्रोन तक का उत्पादन करता है। चाइना डेली के अनुसार, 'चीन उच्च तकनीक वाले आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस पर आधारित क्रूज़ मिसाइल का विकास कर रहा है।'


बीते जून में 'चाइना इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी ग्रुप कारपोरेशन' ने दावा किया था कि उसने एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए 119 ड्रोन को एकसाथ उड़ाया था। पिछले महीने अमरीका ने भी अपने देश की एआई कंपनियों में चीनी निवेश पर चिंता जताई थी।


उसे डर है कि अमरीकी टेक्नोलॉजी का चीन अपनी मिलिटरी क्षमता बढ़ाने में इस्तेमाल कर सकता है। प्रधानमंत्री ली केकियांग ने नेशनल पीपुल्स कांग्रेस में बीते मार्च में एक सरकारी रिपोर्ट पेश की, जिसमें एआई को पहली बार तेजी से उभरने वाले रणनीतिक उद्योग के रूप में बताया गया था।



बीते मई में चीनी राष्ट्रपति भी 'वन बेल्ट वन रोड' इनिशिएटिव फ़ोरम में अपने शुरू के भाषण में इसका ज़िक्र कर चुके हैं। अतीत में भी चीन ने अन्य बुनियादी उद्योगों में अपनी पूरी राजनीतिक ताक़त लगाई है, मसलन रिन्यूवेबिल एनर्जी के मामले उसने बड़ी सफलता हासिल की। हालांकि समाज और रोज़गार के अवसरों पर इसके प्रभाव को लेकर वरिष्ठ अधिकारी भी चिंता जता चुके हैं।


साइंस एंड टेक्नोलॉजी मामलों के उपमंत्री वांग झिगैंग के अनुसार, "दूसरी टेक्नोलॉजी की तरह, एआई भी कुछ समस्याओं को अपने साथ ले आएगा, जैसे बेरोज़गारी, सामाजिक नैतिकता में पतन और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांतों को चुनौती भी हो सकती है।"
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