आमतौर पर माना जाता है कि मदरसों में कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा दिया जाता है लेकिन बांग्लादेश में ऐसा नहीं है। यहां पुलिस के आतंकरोधी दस्ते ने हाल ही में 2015 से 2017 के बीच गिरफ्तार किए गए 3000 संदिग्धों की डाटा विश्लेषण रिपोर्ट पेश की है। इसमें बताया गया है कि सिर्फ मदरसों अकसर मदरसों में दी जाने वाली इस्लामी तालीम को ही आतंकवाद के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।
बांग्लादेश पुलिस की इस रिपोर्ट की मानें तो स्पष्ट है कि कट्टरपंथ या आतंकवाद का रास्ता अपनाने वाले अधिकतर लोग मदरसों में नहीं बल्कि सामान्य स्कूलों में पढ़े-लिखे हैं। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के हवाले से देश के खुफिया विभाग के अतिरिक्त डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल मोहम्मद मोनिरुज्मान ने बताया कि 56 फीसदी कट्टरपंथियों ने सरकारी स्कूलों में तालीम हासिल की जबकि 22 फीसदी ने निजी स्कूलों में पढ़ाई की।
करीब इतने ही लोगों ने मदरसों में तालीम ली। यानी मदरसों में शिक्षा लेकर कट्टरपंथ अपनाने वाले लोगों की तादाद 25 फीसदी से भी कम है। यह हाल भी तब हैं जबकि देश में महज अंग्रेजी माध्यम के 200 स्कूल हैं और मदरसों की संख्या 20 हजार है। हालांकि मोनिरुज्मान ने बताया कि इन आंकड़ों के बावजूद सरकार को मदरसों के पाठ्यक्रम पर नजर रखना बंद नहीं करना चाहिए।
इंटरनेट बढ़ा रहा कट्टरपंथ
पुलिस रिपोर्ट बताती है कि हिरासत में लिए गए 80 फीसदी लोग इंटरनेट के जरिए कट्टरपंथी विचारधारा के संपर्क में आए, जबकि बाकी के 20 फीसदी जान पहचान वालों की बातों में आ कर कट्टरपंथी बने। बंगाली और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे मदरसों वाले छात्रों की तुलना में इंटरनेट का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं और इसलिए इंटरनेट तक पहुंच कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रही है।