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फेसबुक के खिलाफ स्पर्धारोधी कानून के तहत मुकदमा चुनौतियों से भरा

Sat, 12 Dec 2020 07:03 AM IST
Kuldeep Singh न्यूयॉर्क टाइम न्यूज सर्विस, सैन फ्रांसिस्को
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फेसबुक पर अनैतिक समझौते कर अपने क्षेत्र में किसी और कंपनी को न टिकने देने के आरोप में स्पर्धारोधी कानून के तहत दायर मुकदमे को नागरिक संगठनों से लेकर अमेरिका के सांसदों तक ने सराहनीय कदम बताया है। हालांकि माना जा रहा है कि यह केस जीतना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। वजह अमेरिका के बेहद जटिल स्पर्धारोधी कानून को आधुनिक टेक कंपनियों के खिलाफ इस्तेमाल करना टेढ़ी खीर है।

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इसी तरह के एक मामले में 1984 में यहां कि टेलीकॉम कंपनी एटी एंड टी को कोर्ट ने आदेश दिए थे कि वह बेबी वेल्स जैसी क्षेत्रीय कंपनियों का अपनी कंपनी में किया विलय रद्द करे। लेकिन यह करीब साढ़े तीन दशक पहले की बात है।

पहली चुनौती : प्रतियोगिता की हत्या कैसे की?
सबसे बड़ी चुनौती तो यही साबित करना होगा कि जब फेसबुक ने इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप को खरीदा तो उसका इरादा अपने सामने पनप रही प्रतियोगिता की हत्या करना था।
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दूसरी चुनौती : जब गलत था तो रोका क्यों नहीं?
अदालत को बताना होगा कि 2012 और 2014 में जब विलय हुआ तो नियामक एजेंसियों ने इन्हें गलत क्यों नहीं माना और रोका क्यों नहीं? अगर यह विलय तब सही था तो आज क्यों गलत है?

तकनीकी दिक्कत भी मौजूद 
विलय के काफी साल बाद तक जुकरबर्ग ने व्हाट्सएप इंस्टॉल और फेसबुक मैसेंजर को अलग-अलग चलाया लेकिन पिछले वर्ष इन्हें एक-दूसरे से जोड़ने की घोषणा की। इसके तहत इंस्टाग्राम अकाउंट से फेसबुक मैसेंजर पर संदेश भेजने की सुविधा देने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। यह जटिल तकनीकी काम है जिन्हें शुरू करने में 18 महीने लगे। अगर फेसबुक मुकदमा हारा व इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप को फेसबुक से अलग कंपनियां बनाने का आदेश हुआ तो इसे पूरा करना भी बेहद जटिल होगा।

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