शनिवार को सेना ने अपने बयान में कहा कि वह संविधान के अनुपालन के लिए प्रतिबद्ध है। एनएलडी ने इस बयान को उचित स्पष्टीकरण बताते हुए स्वीकार कर लिया है। आंग सान सू ची की पार्टी एनएनडी के प्रवक्ता मयो न्यूंत ने कहा कि उनकी पार्टी चाहती है कि सेना चुनाव के मामले में जनता की इच्छा को स्वीकार करने वाला संगठन रहे।
नवंबर के चुनाव में एनएलडी का मुख्य मुकाबला यूनियन सॉलिडरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) से हुआ था। यूएसडीपी को सेना का राजनीतिक संगठन माना जाता है। इस पार्टी ने फिर से चुनाव कराने की मांग की है। उसने चुनावी गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए लगभग 200 शिकायतें दर्ज कराई हैं। वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले गई है। म्यांमार में संविधान सेना ने ही तैयार कराया था।
इसके तहत संसद में सेना के लिए 25 फीसदी सीटें रिजर्व रहती हैं। प्रमुख संस्थानों पर भी सेना का नियंत्रण है। इसके बावजूद 2015 और 2020 में हुए चुनावों में एनएलडी की भारी जीत हुई। इसलिए अतिरिक्त 25 फीसदी सीटें हाथ में रहने के बावजूद सेना नियंत्रित पार्टी सत्ता में आने लायक सीटें नहीं हासिल कर सकी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हालांकि सेना आज भी म्यांमार में राजनीतिक रूप से काफी मजबूत है, लेकिन सत्ता हथियाने की उसकी कोशिश को जनता का समर्थन मिलना अब मुश्किल है। यंगून स्थित तम्पादीपा इंस्टीट्यूट से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक खिन जाव विन ने टीवी चैनल अल-जजीरा से कहा कि अगर ऐसा ने ऐसी कोशिश की, तो उसकी जनता में बहुत कड़ी प्रतिक्रिया होगी।
लोगों के मन अभी भी सैनिक शासन की याद ताजा है और वे इसकी सोच से ही नफरत करते हैं। खिन ने कहा कि अगर सेना ने सत्ता हथियाई तो उसे सड़कों पर विरोध झेलना पड़ सकता है।
म्यांमार की संसद की 498 सीटों के लिए चुनाव कराए गए थे। इनमें से 396 सीटें एनएनडी ने जीतीं। जानकारों में इस बात पर एकमत हैं कि ये जनादेश इतना बड़ा है कि सेना के लिए इसकी अनदेखी करना आसान नहीं होगा। इसके बावजूद इस समय सैनिक तख्ता पलट का भय मंडरा रहा है।