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चिप इंडस्ट्री: अमेरिका पर निर्भरता घटाने की यूरोपियन यूनियन की योजना को बड़ा धक्का

Thu, 03 Jun 2021 03:37 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स

सार

जानकारों के मुताबिक एनविडिया के आर्म्स से हुए समझौते से अमेरिका को कई फौरी फायदे होंगे। ईयू अब हाई टेक संबंधी सप्लाई के लिए अमेरिका पर अधिक निर्भर हो जाएगा। ये स्थिति उस समय पैदा हुई है, जब ईयू अमेरिका और चीन दोनों पर अपनी निर्भरता घटाने की कोशिशों में जुटा हुआ है...
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विस्तार
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माइक्रोचिप इंडस्ट्री में अमेरिका और एशिया के मुकाबले खड़े होने की यूरोपियन यूनियन (ईयू) की महत्वाकांक्षा  को एक तगड़ा झटका लगा है। अमेरिका की चिप बनाने वाली कंपनी एनविडिया (Nvidia) ने जापानी कंपनी सॉफ्ट बैंक के स्वामित्व वाली ब्रिटिश एक चिप निर्माता कंपनी आर्म्स के अधिग्रहण का समझौता कर लिया है। ये करार 40 अरब डॉलर में हुआ है। जानकारों का कहना है कि अब अमेरिकी और ब्रिटिश कंपनियों का साझा उद्यम इस क्षेत्र की एक बड़ी हैसियत के साथ उभर सकता है। उससे मुमकिन है कि ईयू की ऐसी ही योजना पर पानी फिर जाए।

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ईयू के आंतरिक बाजार आयुक्त थियरी ब्रेटॉन ने वेबसाइट पॉलिटिको.कॉम से कहा कि ईयू ताजा समझौते के रणनीतिक पहलू से अवगत है। उन्होंने कहा कि अब ईयू के सामने असल सवाल यह है कि क्या 27 देशों का ये समूह यूरोप का अपना सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री विकसित करने में सक्षम है।

जानकारों के मुताबिक एनविडिया के आर्म्स से हुए समझौते से अमेरिका को कई फौरी फायदे होंगे। ईयू अब हाई टेक संबंधी सप्लाई के लिए अमेरिका पर अधिक निर्भर हो जाएगा। ये स्थिति उस समय पैदा हुई है, जब ईयू अमेरिका और चीन दोनों पर अपनी निर्भरता घटाने की कोशिशों में जुटा हुआ है। ईयू इस समय अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक रणनीति को नया रूप देने के प्रयास में है। इस क्रम में फिलहाल सबसे ज्यादा जरूरत चिप इंडस्ट्री में खुद को खड़ा करने की महसूस की गई है। लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन ने अब उसका ये लक्ष्य ज्यादा मुश्किल बना दिया है।
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वेबसाइट पॉलिटिको के मुताबीक एनविडिया ने पिछले साल सितंबर में आर्म्स को खरीदने की बातचीत शुरू की थी। आर्म्स ने 500 से अधिक कंपनियों को चिप ब्लूप्रिंट संबंधी लाइसेंस दे रखा है। इस चिप्स का इस्तेमाल अरबों प्रोसेसरों में हुआ है। इन कंपनियों में इंटेल, क्वैलकॉम, एपल, और एनविडिया जैसी अमेरिकी कंपनियां भी शामिल हैं। साथ ही यूरोपीय चिप निर्माता कंपनियों एसटी माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और एनएक्सपी सेमीकंडक्टर्स में इस्तेमाल होने वाले चिप भी आर्म्स से लाइसेंस प्राप्त हैं।

जानकारों ने कहा है कि आर्म्स की यूरोप में चिप से संबंधित क्षेत्रों में केंद्रीय भूमिका है। इसी क्षेत्र में ईयू भी अपनी पैठ बनाना चाहता है। इंटरनेट ऑफ थिंग्स, कनेक्टेड ट्रांसपोर्ट सिस्टम, उच्च प्रदर्शन क्षमता वाले कंप्यूटरों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी अति आधुनिक तकनीकों के विकास में आर्म्स के चिप पहले से अहम रोल निभा रहे हैं।

बताया जाता है कि ताजा करार से अमेरिका की कई कंपनियां चिंतित हैं। क्वॉलकॉम, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट ने चिंता जताई है कि इससे एनविडिया की मोनोपॉली कायम हो सकती है। उनके मुताबिक मुमकिन है कि आगे चल कर एनविडिया आर्म्स के पेटेंट वाले चिप का इस्तेमाल उनकी कंपनियों को ना करने दे, जिनके साथ उसकी प्रतिस्पर्धा है। ब्रिटेन के पूर्व व्यापार मंत्री और अब यूरोप में चीनी कंपनियों के सलाहकार पीटर मेडलसन ने भी इस समझौते को मोनोपॉली की दिशा में कदम बताया है और ईयू से इसके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने की अपील की है।

ब्रिटिश सरकार ने अपने प्रतिस्पर्धा और बाजार प्राधिकार (सीएमए) से कहा है कि वह इस समझौते की राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से जांच करे। बताया जाता है कि अमेरिका और चीन में इस करार से उठे मोनोपॉली के मुद्दे की जांच शुरू करने पर विचार हो रहा है। लेकिन असल समस्या ईयू के सामने खड़ी हुई है। इस सिलसिले में याद दिलाया गया है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने यूरोप को हाई टेक संबंधी निर्यात में कई पाबंदियां लगा दी थीं। अब अगर आर्म्स पूरी तरह अमेरिकी कंपनी का हिस्सा बन गया, तो हो सकता है कि यूरोप भविष्य में स्मार्ट मीटर, फोन और कार जैसे उत्पाद भी अमेरिका से खरीदने के लिए मजबूर हो जाए। एक तकनीकी विशेषज्ञ ने पॉलिटिको से कहा- ‘आर्म्स को खरीद कर एनविडिया ने इंटरनेट ऑफ थिंग्स से लेकर सुपरकंप्यूटिंग और क्लाउड तक जैसे भावी उद्योगों पर नियंत्रण कायम करने के लिए अमेरिकी सरकार को सक्षम बना दिया है।’

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