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भारत के साथ साथ चीन से भी बढ़ रही है रूस की दोस्ती, अमेरिकी ट्रेडवॉर के चलते बढ़ी नजदीकियां

Thu, 05 Sep 2019 03:51 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन - फोटो : PIB
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की रूस यात्रा से दोनों देशों के बीच दोस्ती और मजबूत हुई है। रूस ने भारत के साथ मिजाइल निर्माण में भी दिलचस्पी दिखाई है। लेकिन दूसरी तरफ लंबे समय तक चीन के साथ तनाव पूर्ण रिश्ते रखने वाले रूस ने अब चीन के साथ भी मजबूत दोस्ती की इबारत लिखनी शुरु कर दी है। चीन और अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड वॉर और रूस और अमेरिका की पुरानी प्रतिद्वंदिता रूस और चीन को नजदीक ला रही है। हाल ही में चीन और रूस के बीच हैवी हेलीकॉप्टर बनाने को लेकर डील पर दस्तखत हुए हैं।

चीन-रूस मिल कर बनाएंगे हेलीकॉप्टर

मास्को के नजदीक झूकोव्स्की में चल रहे रशियन इंटरनेशनल एविएशन एंड स्पेस सलून 2019 (मैक्स) में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में चीन के उद्योग एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री मियाओ वी ने बताया कि इस डील के तहत दोनों देश के बीच हैवी हेलीकॉप्टर विकसित करने को लेकर समझौता हुआ है। जिसके बाद चीन सरकार इस प्रोजक्ट को शीघ्रता से शुरू करने के लिए अपनी सहमति प्रदान करेगी।

चीन में बनेंगे 200 हैवी हेलीकॉप्टर्स

रूम में हो रहे इस मैगा इवेंट में चीन प्रमुख पार्टनर है। यह एडवांस हैवी लिफ्ट कॉप्टर होगा और 40-टन क्षमता वाला होगा, जो 15 टन तक का बोझ उठा सकेगा। यह हेलीकॉप्टर 630 किमी की दूरी 300 किमी प्रति की रफ्तार से तय कर सकेगा। इसे बनाने वाली कंपनी रशियन स्टेट कॉर्पोरेशन (रॉस्टेक) के प्रतिनिधि विक्टर क्लादोव का कहना है कि इस समझौते के तहत ऐसे 200 हैवी हेलीकॉप्टर्स चीन में बनाए जाएंगे, जिनकी डिलीवरी 2032 तक होगी।

रूस देगा टेक्निकल सपोर्ट

खास बात यह है कि हेलीकॉप्टर निर्माण को लेकर दोनों देशों के बीच पिछले चार साल से बातचीत चल रही थी। इस डील के तहत चीन इसके डिजाइन और प्रोडक्शन के लिए जिम्मेदार होगा, जबकि रूस टेक्निकल पार्टनर के तौर पर जिम्मेदार होगा। गौरतलब है कि रूस को पहले से ही ऐसे हैवी हेलीकॉप्टर बनाने का पुराना अनुभव है और उसने 40 टन क्लास से लेकर 56 टन क्लास वाला एमआई-26 जैसा हैवी हेलीकॉप्टर का निर्माण किया है।

चीन ने भी खरीदे एसयू-30 और एस-400 सिस्टम

हाल के दौर में दोनों देशों के बीच सैन्य उपकरणों के साथ व्यापारिक साझेदारी काफी मजूबत हुई है। जो भारत के लिए काफी चिंताजनक है। हाल ही में भारत ने रूस से एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदा है, जिसके लिए एडवांस पेमेंट हो चुका है, जिनकी डिलीवरी 2025 तक करनी होगी। इसके अलावा भारत रूस से युद्धक विमान सुखोई-30 के 272 बेड़े खरीद रहा है। वहीं चीन ने भी रूस से सुखोई-30 और एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदने का ऑर्डर दिया है। वहीं रूस और चीन के बीच अब तक का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास वोस्तोक 2018 हो चुका है, जिसमें तीन लाख सैनिकों ने हिस्सा लिया था। अकेले 2017 में ही रूस ने चीन को 1500 करोड़ अमेरिकी डॉलर के हथियारों का सौदा किया है। वहीं 2016 में इतनी ही राशि का सौदा हुआ था।

भारत के अलावा चीन ने भी खरीदे कुमोव हेलीकॉप्टर्स

रूस और चीन के बीच यह सौदों की साझेदारी केवल सुखोई और मिसाइल डिफेंस सिस्टम तक ही सीमित नहीं है बल्कि चीन ने मल्टीपर्पज हेलीकॉप्टर कुमोव केए-32 का भी ऑर्डर दिया है। चीन 2016 से अभी तक ऐसे 9 हेलीकॉप्टर्स का ऑर्डर दे चुका है, जिनकी खासियत है कि पेट्रोलिंग, खोजबीन अभियान, अग्निशमन के अलावा कई मिशन में यह कारगर है। इसके अलावा यह भारीभरकम सामान के साथ पहाड़ी इलाकों और सघन शहरी इलाकों में भी उतर सकता है। लेकिन कोमोव हेलीकॉप्टर्स का सौदा करने वाली चीन अकेला देश नहीं है। भारत ने भी रूस को 200 हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति का ऑर्डर दिया है। इन हेलीकॉप्टर्स का निर्माण भी रशियन स्टेट कॉर्पोरेशन (रॉस्टेक) कर रही है। इस समझौते के तहत 40 हेलीकॉप्टर रूस से तैयार होकर आने हैं जबकि 160 हेलीकॉप्टर मेक इन इंडिया अभियान के तहत भारत में बनेंगे।

रूस-चीन के बीच चलेगी ट्रेन

इससे पहले इसी साल मई में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बीजिंग की यात्रा की थी, हालांकि यह यात्रा बेल्ट एंड रोड कार्पोरेशन को लेकर की गई थी, लेकिन इसके निहितार्थ नतीजे निकाले गए। दोनों देशों के बीच मास्को से लेकर बीजिंग तक हाई स्पीड रेल रूट लिंक बनाने को लेकर बातचीत चल रही है, जिसे बाद में बर्लिन तक बढ़ाया जाएगा। रूस के ओब्लास्ट शहर और चीन के हेलॉन्गजियांग के बीच अमूर नदी पर रेल ब्रिज भी बना है, जिसके बाद दोनों देशों के बीच अब सड़क संपर्क शुरू करने की बात चल रही है।  

सुलझाए सारे विवाद

ऐसे में रूस और चीन का नजदीक आना भारत के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है। रूस में चीन का निवेश लगातार बढ़ रहा है, यहां तक कि चीन रूस से ही अपनी तेल की जरूरतों को भी पूरा कर रहा है। इन सभी घटनाक्रमों को अमरीका और चीन के बीच शुरू हुए ट्रेड वॉर से जोड़ा जा रहा है, ऐसे में दोनों देशों का साथ आना लाजिमी है। बावजूद इसके 1969 में दोनों देश दमेंस्की द्वीप पर अधिकार को लेकर आमने-सामने आ चुके हैं। दोनों देशों के बीच 4000 किलोमीटर से ज़्यादा का सीमा विवाद साल 2000 में सुलझ चुका है, वहीं जिस दमेंस्की द्वीप को लेकर दोनों देश आपस में भिड़े थे, वह सीमा समझौते के बाद अब चीन के अधिकार में है।

भारत की जगह ले रहा चीन

जिस तरह से अमेरिका और भारत की नजदीकियां बढ़ रही हैं, उससे रूस को भी पुराने सहयोगी की कमी खलने लगी है, जिसकी जगह अब धीरे-धीरे चीन ले रहा है। हालांकि रूस ने कभी खुले तौर पर इसकी मुखालफत नहीं की है, लेकिन दूसरे तरीकों से उसकी नाराजगी सामने आ रही है। सुखोई-30 की डील इसका उदाहरण है। डील के तहत भारत को लड़ाकू विमान की टेक्नोलॉजी भी ट्रांसफर की गई थी, लेकिन अब चीन को भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफऱ की गई है।
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