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दीवार रिटर्न्स: अब उसके पास मां भी नहीं है! तो क्या होगा

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आइए, आज आपको एक बिल्कुल ओरिजनल कहानी सुनाता हूं। दो भाई होते हैं। एक बीड़ी, सिगरेट, शराब पीता है, स्मगलिंग करता होता है। दूसरा ईमानदार है, शरीफ़ और पुलिस इंस्पेक्टर है। एक के पास बंगला है, गाड़ी है, ऐशोआराम की हर चीज़ है।
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दूसरे के पास बस धांसू सी पंचलाइन है-- यानी उसके पास मां है। लेकिन इस धांसू सी पंचलाइन के बावजूद कहानी का हीरो कौन है? अब यह भी बताना पड़ेगा? दीवार फ़िल्म नहीं देखी है क्या?

वैसे, इस फ़िल्म का नाम 'दीवार' नहीं 'मां का प्यार' टाइप कुछ होना चाहिए था क्योंकि अंदर की कहानी यही थी कि मां किसको ज़्यादा प्यार करती है। अरे, माफ़ कीजिएगा। मैने आपसे कहा था कि ओरिजनल स्टोरी है। दरअसल, इस कहानी से प्रेरणा लेकर ही आपको एक ओरिजनल कहानी सुनाने की कोशिश कर रहा हूं।
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समझ गए होंगे कि हीरो कौन है?

चलिए, फिर कोशिश करते हैं। ये कहानी अमेरिका की है। दो भाई होते हैं। एक बिगड़ैल था, जवानी में गंजेड़ी और शराबी था, जब वो लत छूटी तो इराक़बाज़ी का शौक लग गया। उसके पास बंगला, गाड़ी, एयरफ़ोर्स वन और व्हाइट हाउस की चाबी भी थी। दूसरा, हमेशा शरीफ़ था और उसके पास मां और बाप दोनों थे। अगर आपने दीवार देखी है, तो ज़ाहिर है आप भी समझ गए होंगे कि हीरो कौन है।

लेकिन कहानी का ओरिजनल ट्विस्ट यह है कि अब शरीफ़ भाई को बिग़ड़ैल भाई की ज़रूरत आन पड़ी है। मां-बाप की नज़र में भी बिगड़ैल भाई अब ज़्यादा कामयाब और लायक नज़र आ रहा है।

मां ने तो एक टीवी चैनल पर हंसते हुए ही सही अपने शरीफ़ बेटे से कह दिया, "मैंने कब कहा कि मैं तुझसे ज़्यादा प्यार करती हूं।" इसे कहते हैं, बुरा वक़्त आता है तो मां की नज़रें भी बदल जाती हैं। अरे हां! इंटरवल होने को आया और मैने किरदारों के नाम तो बताए ही नहीं। तो एक नाम है जेब बुश और दूसरे का नाम जॉर्ज डब्ल्यू बुश।

हरकतों का ख़ामियाज़ा
जेब बुश को देखकर आपको याद आएंगे देसी शादियों वाले बिल्कुल शरीफ़ से मामाजी, जो बगल में रेक्सीन का बैग दबाए घूमते रहते हैं। वे कभी पंडित तो कभी बारातियों के नखरे झेल रहे होते हैं। उन्हें देखकर आपको अपनी क्लास का हमेशा फ़र्स्ट बेंच पर बैठने वाला वो बच्चा भी याद आ सकता है, जो हर सवाल के जवाब के लिए हाथ खड़े करता था और मास्टरजी का चहेता होता है।

जॉर्ज बुश को देखकर आपको जो कुछ भी याद आए उसे अपने मन में रखें। वैसे भी, उनके क़िस्से आपने आठ साल तक सुने हैं और अब तक सुन रहे हैं। तो ख़ैर, जेब बुश इस बार एक लायक बेटे होने का फ़र्ज़ अदा करते हुए राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनने की रेस में है, यह तो आपको मालूम ही है।

मुश्किल यह है कि उनकी रेटिंग इतनी ख़राब है कि जॉर्ज बुश की रेटिंग आठ सालों की इराक़बाज़ी के बाद भी इससे बेहतर थी। शुरू में विद्वानों की राय थी कि जेब बुश को जार्ज बुश की हरकतों का ख़ामियाज़ा भुगतना होगा और उन्हें ख़ुद को उनसे दूर रखने की कोशिश करनी होगी।
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मां भी यही चाहती है

लेकिन वही सलाहकार अब कह रहे हैं कि जेब बुश के सुस्त और ढीले पड़ रहे कैंपेन के लिए शायद जॉर्ज बुश नीली गोली का काम कर सकते हैं। उसके साइड इफ़ेक्ट्स होंगे, लेकिन तब की तब देखी जाएगी। और ख़बर यह आ रही है कि जेब ने फ़ोन करके कहा है, भाई! आज मुझे तुम्हारी ज़रूरत आ पड़ी है। मां भी यही चाहती है।

(ठीक है, ठीक है ये मां वाली लाइन मैने अपनी तरफ़ से जोड़ दी है। इतना तो चलता है।) और जॉर्ज बुश का भी कहीं पर बयान दिखा है कि उन्होंने जेब बुश से कहा है, रन, जेब रन! हिंदी-उर्दू में इस लाइन को दो तरह से पढ़ा जा सकता है--यानी दौड़ो जेब, दौड़ो!

लेकिन जेब बुश साहब मेरी मानें तो इसे कुछ यूं पढ़ें--भाग जेब, भाग! (जो भी बची-खुची इज़्ज़त है, उसे लेकर भाग वर्ना कहीं का नहीं रहेगा)
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