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यूएस: क्या घर से निकलेगा मतदाता?

Sun, 04 Nov 2012 08:09 PM IST
बीबीसी हिन्दी
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अमेरिका में मंगलवार को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहा है। ऐसे में चुनावी मुहिम उन लोगों पर केंद्रित हो गई है जिन्होंने अभी मन नहीं बनाया है कि वो किसे वोट देंगे।
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अब दोनों उम्मीदवार यानी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रिपब्लिकन पार्टी के मिट रोमनी चुनाव प्रचार के आखरी दौर में उन राज्यों में सभाएं कर रहे हैं जहां लोगों का रुख अभी साफ नहीं है। मुकाबला कांटे का है। यहां कुछ विशेषज्ञ मान रहे हैं कि फैसला इस बात पर होगा कि किस उम्मीदवार का खेमा चुनाव के दिन कितने समर्थकों को वोट डालने के लिए चुनाव केन्द्रों तक ले जाने में कामयाब होता है।

इस बात में काफी सच्चाई है। मिट रोमनी के समर्थक और वर्जीनिया राज्य में रिपब्लिकन पार्टी के एक नेता पुनीत अहलूवालिया कहते हैं, "हमारे कार्यकर्ता अब बाहर निकल कर अपने समर्थकों के घरों पर दस्तक दे रहे हैं। उन्हें हम चुनावी पत्र हाथ में दे रहे हैं और मिट रोमनी के नाम के आगे एक 'यस' का निशान लगा कर उनसे कह रहे हैं कि आप इसी नाम के आगे वोट दें।"
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तूफान का 'फायदा'
बराक ओबामा को दस लाख डॉलर चुनावी चंदा देने वाले भारतीय मूल के फ्रैंक इस्लाम कहते हैं कि उनके नेता ने सैंडी तूफान के बाद चुनावी मुहिम दोबारा शुरू करने के बाद उनसे कहा की वो घर-घर जाकर दस्तक दें। ओबामा खेमे के एक और नेता ने कहा, "पहले उन्होंने हम जैसे चुनावी चंदा देने वालों को धन्यवाद कहा और फिर अपील की कि हम लोग घर-घर जाकर लोगों को चुनाव के दिन या उससे पहले वोट डालने पर जोर दें।"

सैंडी तूफान के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति की साख बेहतर हुई है। तबाही के शिकार न्यू जर्सी राज्य के गवर्नर और रिपब्लिकन नेता क्रिस क्रिस्टी ने बराक ओबामा की भरपूर तारीफ की, जबकि वो ओबामा के आलोचकों में से एक रहे हैं। पूर्व विदेश मंत्री कॉलिन पॉवेल ने भी ओबामा को समर्थन देने का ऐलान किया है।

रिपब्लिकन पार्टी के भीतर इससे ये अनुमान लगाया जा रहा है की मिट रोमनी की नैया को उनके बड़े और वरिष्ठ नेता छोड़ कर जा रहे हैं। पार्टी के एक नेता ने कहा कि सैंडी से पहले मिट रोमनी की लोकप्रियता बढ़ रही थी। "उनके साथ एक जनसमर्थन था। लेकिन सैंडी के बाद ओबामा एक दबंग नेता के रूप में उभर कर निकले हैं और ये जनसमर्थन टूट गया।" रिपब्लिकन पार्टी के समर्थकों ने भी सैंडी तूफान से निपटने पर ओबामा की भूमिका की तारीफ की।

किस पर कौन पड़ेगा भारी
लेकिन पार्टी में सभी इस तर्क को मानने के लिए तैयार नहीं। पार्टी के एक कार्यकर्ता फुजैल अली ने कहा, "मुझे नहीं लगता सैंडी का ओबामा को कोई खास फायदा होने वाला है। तूफान पीड़ित राज्यों में लोगों ने पहले ही मन बना लिया था कि वो वोट किसे देंगे। अब वो मन बदलने वाले नहीं। दूसरी बात ये कि रोमनी का समर्थन अंदर ही अंदर गोरे लोगों में और मज़बूत होता जा रहा है। अंडरकरेंट रोमनी की हिमायत में है।"

खुद मिट रोमनी के एक सलाहकार का कहना है, "7 नवंबर की सुबह जब सूरज निकलेगा तो देश का एक नया राष्ट्रपति चुना जा चुका होगा। अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति मिट रोमनी होंगे। हम सभी सर्वेक्षणों में आगे हैं और लगातार अपनी बढ़त बनाए हुए हैं। जीत हमारी होगी।" ऐसा मालूम होता है कि पूरा देश रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के समर्थन में विभाजित है। आधी आबादी एक पार्टी के साथ है तो दूसरी आधी आबादी दूसरी पार्टी के साथ।

निष्पक्ष राय रखने वाले इस देश में कम ही है। जो निष्पक्ष हैं भी उनके अनुसार मुकाबला कांटे का ज़रूर है लेकिन ओबामा को हराना आसान नहीं होगा। वैसे भी देश के चुनावी इतिहास में ऐसा कम ही हुआ है कि कोई राष्ट्रपति चुनाव में हार जाए। दूसरी तरफ वो कहते हैं कि ओबामा का समर्थन करने वाले लोग अब भी वही हैं जो चार साल पहले थे, यानी काले, लातिनी, एशियाई और महिलाएं।

हां, इतना निष्पक्ष राय रखने वाले भी कहते हैं कि ये तमाम समुदाय ओबामा से अधिक खुश नहीं हैं इसीलिए इनके अन्दर चार साल पहले वाला जोश नहीं है। इसीलिए उनका चुनाव के दिन मतदान केंद्रों पर जाकर वोट देना बराक ओबामा के दोबारा चुने जाने के लिए जरूरी है।
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