क्या आपको लगता है कि एक लॉटरी लग जाए तो आप हमेशा ख़ुश रह सकते हैं? बहुत से लोगों को ऐसा लगता है-अमेरिका के उस दुकानदार समेत जिसने 18,29,76,30,000 रुपये की पावरबॉल लॉटरी जीती थी।
लेकिन इससे पहले कि आप अपनी सभी उम्मीदें और सपने किसी लॉटरी टिकट पर दांव में लगा दें कुछ तथ्यों पर नज़र डालाना ज़रूरी है। तथ्य बताते हैं कि बहुत ज़्यादा पैसे मिलने से अंततः कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
लॉटरी जीतना सच्ची खुशी की वजह नहीं बन सकता।
एक शोध के अनुसार जिनकी बड़ी लॉटरी निकली थीं, वो अंततः उन लोगों से ज़्यादा ख़ुश नहीं थे, जिन्होंने टिकट तो खरीदा थी लेकिन उनकी लॉटरी नहीं निकली थी।
इसकी एक वजह तो यह हो सकती है कि जिनकी लॉटरी निकली थी वह अपनी नई संपत्ति के आदी हो जाते हैं और खुशी के पुराने स्तर के अनुकूल हो जाते हैं।
इस प्रक्रिया को “हेडोनिक ट्रेडमिल” भी कहा जाता है।
इसकी एक अन्य व्याख्या यह भी है कि ख़ुशी इस पर निर्भर करती है कि हम अपने साथियों के साथ तुलनात्मक रूप से कैसा महसूस करते हैं।
मान लीजिए कि आपकी लॉटरी निकलती है और आप अपने पड़ोसियों से रईस हो जाते हैं। फिर आप किसी महंगी जगह पर बड़े बंगले में रहने के लिए चले जाते हैं।
आपको लगता है कि नए बंगले, नए पड़ोसियों से आपको ख़ुशी मिलेगी।
लेकिन आप अपने नए बंगले से बाहर झांकते हैं और देखते हैं कि आपके सभी नए पड़ोसियों के बंगले आपसे बड़े हैं।
वनीला या पिस्ता
यकीनन यह दोनों तथ्य ख़ुशी पर प्रभाव डालते हैं लेकिन ज़्यादा गहरा रहस्य यह है कि हम यह क्यों नहीं जानते कि किस सीज़ से हमें ख़ुशी मिलेगी?
आखिर हम पैसा उन चीज़ों पर ख़र्च क्यों नहीं करते जिस चीज़ से हमें ख़ुशी मिलेगी?
दिक्कत यह है कि ख़ुशी ऊंचाई, वज़न या आय जैसी कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आसानी से मापा जा सकता हो।
ख़ुशी एक जटिल, अनिश्चित स्थिति है जो कई बार मामूली मज़ेदार चीज़ों से मिल जाती है और कई बार इसके लिए सालों या दशकों के संदर्भ की ज़रूरत पड़ती है।
ऐसा भी लगता है कि ख़ुशी को मापने की कोशिश भर से हम उस चीज़ से दूर हो जाते हैं जिससे हमें सबसे ज़्यादा ख़ुशी मिल सकती है।
शिकागो स्कूल ऑफ़ बिज़नेस के क्रिस्टोफ़र ह्सी द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन से यह बात सामने आती है।
ह्सी का अध्ययन एक सामान्य चयन पर आधारित थाः इसमें सहभागियों को छह मिनट के एक काम के लिए पुरस्कार के रूप में वनीला आइसक्रीम और सात मिनट के काम के लिए पुरस्कार के रूप में पिस्ता आइसक्रीम जीतने का विकल्प दिया गया।
सामान्य परिस्थितियों में 30% से भी कम लोगों ने 7 मिनट के काम को चुना।
मुख्यतः इसलिए क्योंकि उन्हें वनीला आइसक्रीम पिस्ता से ज़्यादा पसंद थी।
इस शोध के दूसरे चरण में सहभागियों के एक और समूह को भी यही विकल्प दिए गए, लेकिन इस बार अंकों को भी इसमें शामिल कर लिया गया।
छह मिनट के काम के लिए 60 अंक या सात मिनट के काम के लिए 100 अंक दिए गए। 50-99 अंक पर वनीला और 100 अंक पर पिस्ता आइसक्रीम का पुरस्कार था।
हालांकि सभी कार्य और प्रभाव एक जैसे ही थे फिर भी अंक प्रणाली ने लोगों के चयन को नाटकीय रूप से प्रभावित किया।
अधिकतर लोगों ने ज़्यादा समय वाले काम को चुनाव और 100 अंक कमाए- जिससे वह पिस्ता आइसक्रीम वाला पुरस्कार जीत सकते थे।
फिर भी उसी अनुपात में (करीब 70%) लोगों ने कहा कि उन्हें वनीला पसंद है।
अंकों का खेल
इस और अन्य प्रयोगों के आधार पर ह्सी का निष्कर्ष था कि सहभागी अपने अंकों के साथ अपनी ख़ुशी बढ़ा रहे हैं।
अंक सिर्फ़ माध्यम है- ऐसी चीज़ जो हमें उस चीज़ तक पहुंचने का मौका देती है जो हमें ख़ुशी देगी।
चूंकि अंकों को मापना और तुलना करना बेहद आसान है- 60 और 100 का फ़र्क बहुत अधिक है- इसलिए यह हमारी आइसक्रीम की पसंद पर हावी हो जाता है।
तो अगली बार अगर आप इनामी राशि को देखकर लॉटरी टिकट खरीद रहे हैं या किसी सामान की गुणवत्ता उसकी कीमत से तय कर रहे हैं या वेतन से नौकरियों का आकलन कर रहे हैं तो इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करें कि लॉटरी, कपड़े या नौकरी आपको कितनी ख़ुशी देगी।
बनिस्पत इसके कि अंकों के आधार पर चीज़ों की तुलना करें।
पैसे से ख़ुशी नहीं ख़रीदी जा सकती और इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि पैसा दरअसल हमें उस चीज़ से विमुख कर देता है जिससे हमें सचमुच में ख़ुशी मिलती है।
टॉम स्टाफ़र्ड/मनोविज्ञान प्रवक्ता, शेफ़ील्ड विश्वविद्यालय